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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि । उच्चारण करना बचन दुष्परिणधान कहलाता है । शरीर को हिलाना डुलाना, इधर-.. उधर देखना, मच्छर को भगाना तथा बीच में ग्रासन बदलना यह सब कायदुष्परिणधान कहलाता है और मन को तत्त्वचितन से हटाकर इधर-उधर के विषयों में लगाना मनोदुष्प्रणिधान हैं । वेगार समझकर अनुत्साह से सामयिक करना अनादर कहलाता है । चार आदमियों की सुखद गोष्ठी चल रही है। इतने में सामयिक का समय हो गया । इस स्थिति में गोष्ठी को छोड़कर अनादर से सामग्रिक करने को अनादर नाम का अतिचार बनता है । चित्त की एकाग्रता न होने से मन्त्र या सामयिक पाठ को भूल जाना. अस्मर रंग कहलाता हैं । जब इन पांच अतिचारों को भाव पूर्वक बचाने का प्रयत्न किया जाता है, लभी निरति चार सामयिक शिक्षावृत होता है । ऊपर कहे पांच अतिचारों में यद्यपि मनोदृष्प्रणिधान नामक अतिवार को बचाना कठिन कार्य हैं, तथापि अभ्यास पूर्वक वह बचाया जा सकता है। उसके पिक में पहला है कि तो दुष्प्रणिधान योगमूलक और कायमूलक के भेद से दो प्रकार का है । मन की. जो साधारण वञ्चलता है, वह योग मूलक दुष्परिणधान है और बुद्धि पूर्वक किसी के इष्टअनिष्ट का चिन्तन करने से जो चंचलता होती है, यह कपाय मूलक दुष्प्रणिधान हैं । सर्वप्रथम कपायमूलक दुष्प्रणिधान को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये अर्थात् सामयिक में बैठकर किसी के इष्ट-अनिष्ट का विचार नहीं करना चाहिये । तदन्तर योग मूलक दुष्प्रणिधान को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये । सामयिक में जो मन्त्र पाठ बोला जाता है, उसके अर्थ की मोर लक्ष्य करने से यह योग मूलक वचन या. दुष्प्रणिधान भी दूर किया जा सकता है। धर्मध्यान के जो प्राज्ञा विचय, अपाय-विचय, विपाक-विचय और संस्थान विचय अथवा पिण्डस्थ, पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत के भेद से अनेक भेद बताये गये हैं, उनका चिन्तन करने से भी मन की एकारता होती है -- अत: सामयिक के साथ ध्यान का अभ्यास करना चाहिये ।। प्रश्न :--प्रोषधोपवास का क्या लक्षण है ? उत्तर :-चतुर्दशी और अष्टमी के दिन सर्वदा के लिये अत विधान की. वांछा से चार प्रकार के प्राहारों का त्याग करना प्रोषधोपवास जानना चाहिये । . पर्वण्यष्टम्यां च ज्ञातव्यः प्रोषधोपवासस्तु । चलुरम्यवहार्याणां प्रत्याख्यानं सदेच्छाभिः ॥६१॥ अन्न, पान, खाद्य और लेह्य के भेद से साहार के चार भेद हैं । इन चारों RoRARIA
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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