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________________ अध्याय : पांचवां ] [ १५७ अनात्मा है । सामयिक में स्थित मनुष्य इस प्रकार संसार के स्वरूप का विचार कर और मोक्ष इससे विपरीत है अर्थात् शरण है, शुभ है, नित्य है, सुखरूप है तथा ग्रात्म स्वरूप है, इस प्रकार मोक्ष के स्वरूप का विचार करें। विशेषार्थ :-‍ - सामयिक के समय तत्व-चिन्तन होना चाहिए | तत्वों में प्रमुख जीव तत्व है और जीव तत्व की संसार तथा मोक्ष के भेद से दो अवस्थाएँ हैं । इन दोनों अवस्थाओं का चिन्तन करते हुये संसार और मोक्ष की विशेषता का विचार 'किया जाता है । संसार की विशेषताओं का चिन्तन करते हुए विचार करना चाहिए 'कि यह संसार अशरण, अशुभ, अनित्य, दुःख रूप तथा अनात्मा है अर्थात् आत्मा की शुद्ध अवस्था नहीं है । परन्तु मोक्ष इससे विपरीत शरण, शुभ, नित्य, सुखरूप तथा आत्मा है आत्मा की शुद्ध अवस्था है । ऐसा विचार करने से संसार से उपेक्षा और मोक्ष के प्रति आदर का भाव उत्पन्न होता है । जीव की यह संसार अवस्था, कर्म नोकर्मरूप अजीव के सम्बन्ध से हुई हैं और वह सम्बन्ध भी ग्रासव व बन्ध का कारण हुआ है । इस तरह संसार के स्वरूप चिन्तन के अन्तर्गत अजीव प्रास्त्रव और . बन्ध तत्त्व का चिन्तन ग्राता है । और मोक्ष अवस्था, कर्म-नोकर्म रूप जीव के साथ जीव का सम्बन्ध विघट जाने से होती है और वह सम्बन्ध का विघटन संवर तथा निर्जरा के द्वारा होता है। इस तरह मोक्ष के स्वरूप - चिन्तन के अन्तर्गत संवर और निर्जरा तत्व का चिन्तन आता है । प्रश्न :- सामयिक के प्रतिचार कौन कौन से हैं ? उत्तर : वचन, काय और मन के दुष्प्रणिधान अर्थात् वाग्दुष्प्रणिधान, काय दुष्प्ररिधान, मनोदुष्प्ररिधान, अनादर और अस्मरण ये पाँच परमार्थ से सामयिक के प्रतिचार प्रकट किये जाते हैं । वावकाय मानसांनां दुःप्रणिधानान्यनादरास्मरणे । सामयिकस्यातिगमा व्यज्यन्ते पञ्च भावेनं ॥ वचन, काम और मन ये तीन योग हैं। इनकी खोटी प्रवृत्ति करने को प्रधान कहते है । इस तरह तीन योग सम्बन्धी खोटी प्रवृत्ति के कारण तीन प्रतिचार होते हैं । अनादर का अर्थ अनुत्साह है और अस्मरण का अर्थ एकाग्रता का प्रभाव है । सब मिलाकर सामयिक के पाँच प्रतिचार कहे जाते हैं । विशेषार्थ -- मन्त्र या सामयिक पाठ का उच्चारण करते समय अशुद्ध Prerna
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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