________________
१५६ ]
[ गो. प्र. चिन्तामणि
धारण किये हुये हैं तथापि उन वस्त्रों से उन्हें ममत्वभाव नहीं रहता । इस प्रकार सामायिक करने वाला गृहस्थ सब प्रकार के परिग्रहों से रहित होने के कारण मुनि: जैसी अवस्था को प्राप्त होता है ।
सामायिक करने वाले गृहस्थ और भी क्या करें ?
उत्तर :- सामयिक को स्वीकृत करने वाले गृहस्थ स्थिर समाधि अथवा गृहीत अनुष्ठान को न छोड़ते हुए मौनधारी होकर शीत, उष्ण तथा दंशमशक परिवह को और उपसर्ग को भी सहन करें ।
शीतोष्ण दंशमशक परिषहमुपसर्गमपि च मौन धराः । सामयिक प्रतिपक्षा अधिं कुर्वीरन्नचल योगाः ॥
जिन्होंने सामयिक को स्वीकार किया है, ऐसे गृहस्थों को अपने योग-ध्यान में स्थिर रहकर तथा पीड़ाकारक परिस्थिति के आने पर भी अपनी गृहीत प्रतिज्ञा से विचलित नहीं होते हुए मौन धारी बनकर शीत, ऊष्ण तथा तिर्यंचों के द्वारा किये हुए उपसर्ग को सहन करना चाहिए ।
विशेषार्थ :- सामयिक में बैठने पर यदि सर्दी, गर्मी की बाधा आती है, तिर्यचो के द्वारा कोई
चुपचाप सहन करना
मछरों का उपद्रव होता है अथवा दुष्ट देव, मनुष्य या उपसर्ग किया जाता है, तो उसे दीनता के वचन न कहते हुए चाहिए तथा अपनी गृहीत प्रतिज्ञा से विचलित नहीं होना चाहिये । प्रश्न :- सामायिक क्या विचार करे ? उत्तर :- सामयिक में स्थित मनुष्य इस प्रकार ध्यान करे कि मैं शरण रहित, अंशुभ, प्रनित्य दुःख स्वरूप और अनात्मस्वरूप संसार में निवास करता हूँ और मोक्ष उससे विपरीत स्वरूप वाला है ।
प्रशरणमशुभ मनित्यं दुःखमनात्मानभावयामि भवम् । मोक्षस्तद्विपरीतात्मेति ध्यायन्तु सामयिके ॥८६॥
अपने द्वारा गृहीत कर्मों के वश से चारों गतियों में परिभ्रमण करना भव कहलाता है । मैं जिस भव में रह रहा हूँ वह प्रशारण है - इसमें मृत्यु से कोई रक्षा करने वाला नहीं है । अशुभ कारणों से उत्पन्न होने तथा अशुभ कार्य को करने के कारण प्रशुभ है। चारों गतियों में परिभ्रमण का काल नियत होने से अनित्य है दुःख का कारण होने से दुःख रूप है और ग्रात्म स्वरूप से भिन्न होने के कारण