________________
MARH
।
%3453
अध्याय : पाँचवां ।
[ १५५ एकाग्रता से युक्त होकर करना चाहिये 1 सामायिक से हिंसाविरति अादि पांचों प्रती में पर्णता पाती है। फलतः उनमें महावत जैसा व्यवहार होने लगता है । इसलिए सामायिक को न केवल उपवास या प्रकाशन के दिन में करना चाहिये, किन्तु प्रतिदिन करना चाहिए और जैसा तैसा नहीं, किन्तु यथावत-शास्त्रोक्त विधि का उल्लंघन न करते हुए करना चाहिए । इस श्लोक में सामायिक करने वालों पुरुष के लिए जी 'अनलसेन' और 'अवधानयुक्तेन' ये दो विशेषरा दिये हैं, उनसे सामायिक के योग्य द्रव्य का वर्णन आचार्य ने किया है, ऐसा जान पड़ता है। और इससे सामायिक का काल, क्षेत्र, भाव तथा द्रव्य इन चारों की उपेक्षा वर्णन पूर्ण हो जाता है ।
प्रश्न :-अणुवत ही महायतों में फंसे परिणत होते हैं ? ... उत्तर :- त्र्योंकि सामायिक के काल में प्रारम्भ सहित परिग्रह ही नहीं है, इसलिए उस समय गृहस्थ उपसर्ग के कारण वस्त्र से वेष्टित मुनि ने समान मुनिपने को प्राप्त होता है।
सामयिके सारम्भाः परिग्रहा नैव सन्ति सर्वेऽपि । .. चेलोपसृष्ट मुनिरिव गृही तदा याति यदि भावम् ।।७।।
जब गृहस्थ सामायिक में बैठाता है, तब उसके खेती आदि के प्रारम्भ से सहित बाह्य और अन्तरंग तथा चेतन अचेतन के भेद से सभी प्रकार के परिग्रह नहीं होते, इसलिए उस समय वह उपसर्ग से वस्त्र अोढ़ाये हुये मुनि के समान मुनिपने को प्राप्त होता है।
विशेषार्थ :-सामायिक में वैटने वाला गृहस्थ अमुक निश्चित समय के लिए हिसादि समस्त पापों तथा सब प्रकार के प्रारम्भों का त्याग कर चुकता है। उत्तने समय के लिए वह समस्त परिग्रहों का भी त्याग कर देता है । यद्यपि पद के अनुरूप शरीर पर वस्त्र धारण किये हुए है, तो भी उन वस्त्रों में उसके ममत्व भाव नहीं रहता । यदि सामयिक के काल में कोई दुष्ट मनुष्य उसके शरीर पर स्थित उन वस्त्रों को निकालने की चेष्टा करे तो वह सामयिक से विचलित नहीं होता । उसकी उस समय की अवस्था उस मुनि के समान होती है, जिस प्रकार किसी दुष्ट मनुष्य ने उपसर्ग करने के लिये वस्त्र प्रोढ़ा दिया है । ऐसे मुनि बाह्य में यद्यपि वस्त्र प्रोढ़े हये दिखाई देते हैं, तथापि वस्त्र के प्रति ममत्वभाव न होने से वे वस्त्र रहित ही माने जाते हैं 1 इसी प्रकार गृहस्थ भी सामयिक के काल में यद्यपि अपने पद के अनुरूप वस्त्रं
333
3
।
.