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गो. प्र. चिन्तामगि
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गया है, कि सामयिक के पहले शरीर तथा वचन की चेष्टा अर्थात् शरीर का हिलाना डुलाना तथा वचन का जोर से उच्चारण और वैमनस्य-मन की व्यग्रता अथवा कलुषता को दूर करना चाहिये। साथ ही अन्तरात्मा-मन में जो नाना प्रकार के विकल्प उठते हैं, उन्हें विशेष रूप में दूर करना चाहिये । ऐसे भावों से ही सामयिक में वृद्धि हो सकती है । सामयिक की वृद्धि, उपवास अथवा एकाशन के दिन विशिष्ट रूप से करना चाहिये।
प्रश्न :--क्या सामायिक प्रतिदिन करना चाहिए ?
उत्तर :-ग्रालस्य से रहित और चित्त की एकाग्रता से युक्त पुरुष के द्वारा हिंसा त्याग आदि पाँच वृतों की पूर्ति का कारण सामयिक प्रतिदिन भी योग्य विधि के अनुसार वढाने योग्य है ।।
सामयिकं प्रतिदिवसं यथावदप्यनलसेन चेतव्यं । न्द्रत पञ्चक परिपूरण करणवधान युक्त न ॥८६॥
पिछले इलोक में उपवास तथा एकाशन के दिन सामायिक को बढ़ाने की ... - वात कही गई थी, इसलिए कोई ऐसा न समझ ले कि उसी दिन करने के योग्य है,
अन्य दिनों में नहीं। इसका निराकरण करने के लिए इस श्लोक में कहा गया है कि सायिक प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधि से करना चाहिए, क्योंकि यह सामयिक हिंसाविरति आदि पाँच व्रतों की परिपूर्णता अर्थात् उनकी महावत रूपता का कारग . है । सामयिक करने वाले पुरुष को प्रालस्य रहित तथा चित्त की एकाग्रता से युक्त होना चाहिए।
विशेषार्थ :-कितने ही लोग पालस्य के वशीभूत होकर विस्तर पर बैठे-बैठे ही सामायिक करने लगते हैं तथा खड़े होकर चारों दिशाओं में दण्डवत्, यावर्त तथा शिरोनति नहीं करते हैं । अथवा कुछ लोग ऊँघते-ॐघले हुए सामयिक करते हैं। उन्हें सचेत करते हुए प्राचार्य ने 'मनलसन' विशेषण दिया है, जिसका अर्थ होता है। कि सामयिक प्रालस्य रहित होकर करना चाहिये अर्थात् सामंयिक के जो अङ्ग प्रागमन में बतलाये गये हैं, उन्हें विधि पूर्वक करना चाहिए । कितने ही लोग मालाएं फेरने को
ही सामयिक समझ लेते हैं । अतः वे चित्त की स्थिरता की ओर ध्यान न देकर मात्र . चार-छह मालाएँ फेरकर ही अपना सामयिक का काल पूरा कर लेते हैं। उन्हें सचेत
करते हुए प्राचार्य ने 'अवधानयुक्तन' विशेषण दिया है। अर्थात् सामयिक चित्त की.