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________________ अध्याय : पांचयां ] क्षेत्र बतलाया जा रहा है । सर्वप्रथम सामायिक के लिये एकान्त स्थान होना चाहिये। एकान्त का अर्थ है, जो स्त्री, पुमग तथा नपुंसकों से रहित हो । फिर निर्याक्षेप स्थान होना चाहिये । अर्थात् जिसमें जीन वायु तथा मच्छर मादि का उपद्रव न हो, ऐसा स्थान अटवियों, अपने मकानों, मन्दिरों अथवा पर्वतों की गुफा आदि में कहीं भी हो, वहां प्रसन्न चित्त होकर सामायिक करना चाहिये । 'प्रसन्नधिया' शब्द में प्रसन्न धिर्यस्य स प्रसन्नधिस्तन' इस प्रकार कर्मधारय समास भी होता है । बहुव्रीहि समास के पक्ष में 'प्रसन्नधिया यात्मना' इस प्रकार विशेष्य की कल्पना ऊपर से करनी चाहिये और कर्म धारय समास के पक्ष में 'प्रसन्नधिया' पद का हेतुरूप से व्याख्यान करना चाहिये । ....... विशेषार्थ----सामायिक को प्रसन्न चित्त से करना चाहिये, बेगार समझकर . नहीं । और उसके लिये बुद्धि पूर्वक ऐसा स्थान चुनना चाहिये, जहां किसी प्रकार का उत्पात न हो या चित्त को चञ्चल बनाने वाले कारणों का प्रसंग उपस्थित न हो। बुद्धिपूर्वक निर्द्वन्द्र स्थान में सामायिक के लिये बैंठ चुकने पर यदि कोई बाधा उपस्थित होती है, तो उसे उपसर्ग समझकर समता भाव से सहन करना चाहिये । प्रश्न :--सामायिक में कैसे भाव होने चाहिये ? . .. उत्तर :-शरीरादिक की चेष्टा और मन की व्यग्रता अथवा कलुषता से से निवृत्ति होने पर मानसिक विकल्पों की विशिष्ट निवृत्ति पूर्वक उपवास के दिन अथवा एकाशन के दिन और अन्य समय भी सामायिक करना चाहिये । ध्यापार वैमनस्याद्वि निवृत्त्या मन्तरात्मविनिवृत्त्या । सामायिकं बनीयादुपवासे चैक भुक्ते वा ॥५॥ पिछले दो श्लोकों में सामायिक के योग्य काल और क्षेत्र की चर्चा कर चुकने के बाद इस श्लोक में सामायिक के योग्य भाव की चर्चा की जा रही है। सामायिक किस भाव में किस समय बढ़ायी जा सकती ? इसका उत्तर देते हुए, कहा गया है कि व्यापार-शारीर और वचन की चेष्टा तथा बैमनस्य-मन की व्यरता अथवा मन की कलुषता से विनिवृति होने पर अन्तरात्मा-मानसिक विकल्पों को विशिष्ट रूप से दूर करते हुए उपवास और एकाशन के दिन विशेषरूप से सामयिक को बढ़ाना चाहिये । यहां चकार का ग्रहण किया है, उससे अन्य समयों का भी समुच्चय होता है अर्थात । उपवास और एकाशन के सिवाय अन्य दिनों में भी सामयिक को बढ़ाना चाहिये । विशेषार्थ----इस प्रलोक में सामयिक के योग्य भावों की चर्चा करते हुए कहा । ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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