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________________ . .. . . ... . . .. १५२ ]. [ गो. प्र. चिन्तामणि जान ग्राह्य है । जब तक चोटी में गांठ लगी है, मुठी बंधी है, बस्ता में गांठ लगी है. पालथी वांधकर बैठा हूँ, कायोत्सर्ग मुद्रा से खड़ा हूँ प्रथा पद्मासन से बैठा हूँ, तब तक: सामयिक करूगा, ऐसी प्रतिज्ञा सामयिक करने वाला करता है। इसलिये इन सब में जो काल लगता है, वही सामयिक का काल कहलाता है। विशेषार्थ-जिस प्रकार समय का ज्ञान करने के लिये आज कल घड़ियों का प्रचलन चल पड़ा है, उस प्रकार पहले इनका प्रचलन नहीं था। पहले समय का ज्ञान करने के लिये श्रावक सामयिक में बैठते समय ऐसा विचार कर लेते थे कि जब तक सहज स्वभाव से चोटी की गांठ लगी रहेगी, अथवा जब तक मुट्ठी बांध सगा; अथवा जब तक दुपट्टा आदि की गांठ सहज स्वभाव से लगी रहेगी, अथवा जब तक पालथी बांधकर निराकुलता से बैठा रहूँगा अथवा जब तक निराकुलता से : खड़ा रहँगा, अथवा जब तक निराकुलता पूर्वक पद्मासन से बैठा रहूँगा तब तक सामयिक करूंगा । वही उनका सामयिक का काल कहलाता था। संस्कृत में समय का एक अर्थ प्राचार भी होता है । अतः 'समयं जानन्ति मर्म । जाः' यहां पर समय का अर्थ आचार हो सकता है, और प्राचार का अर्थ विधि है। अतः सामयिक के लिये बैटते समय श्रावक को चाहिये कि वह अपने केशों और वस्त्रों को संभालकर बांध ले, जिससे वे बीच में खुलकर आकुलता उत्पन्न न करें। हाथों की अंगुलियों को खुला न रखें, किन्तु उनकी अंजुलि बाँध ले। आसनों में पालथी. बांधना, कायोत्सर्ग से खड़े होना अथवा पद्मासन से बैठना इन तीन आसनों में जिस ग्रासन से निश्चित समय तक निराकुलता पूर्वक रह सकें उस ग्रासन को स्वीकृत करे सामयिक के बीच में ग्रासनों में परिवर्तन न करें । उक्त श्लोक का एक अर्थ यह भी होता है। प्रश्न :--सामयिक का विशेष अभ्यास कहां बढ़ाना चाहिये ? उत्तर :-वह सामयिक निर्मल बुद्धि के धारक श्रावक के द्वारा स्त्री, पुरुष ... तथा नपुंसकों से रहित प्रदेश में, चित्त में चञ्चलता उत्पन्न करने वाले कारणों से रहित. स्थान में, वनों में, मकानों में अथवा मन्दिरों में भी बढने के योग्य है । ... एकान्ते सामयिक नित्यक्षिपे धनेषु वास्तुषु च। चैत्यालयेषु वापि च परिचेतत्यं प्रसन्नधिया ।।८४६ : • पूर्व प्रलोक में सामायिक का काल बतलाया था, इस श्लोक में सामायिक का
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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