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________________ : अध्याय पांचवा ] [ १५१ 'जो 'मुक्त' शब्द है, उसमें भाववाचक 'क्त' प्रत्यय हुआ है इसलिये 'मुक्त' का अर्थ ''मोचन' छोड़ना होता है । ग्रासमय मुक्ति यह इसका विशेषण है । विशेषार्थ ---- जिनागम में सामायिक और सामयिक इस तरह दो शब्द प्रच लित | उनमें 'सामायिक' शब्द की व्युत्पत्यर्थ इस प्रकार है- 'समाय: - समता प्रयोजनं . यस्य सः सामायिकः इस व्युत्पत्ति के अनुसार समाय - समता भाव की प्राप्ति जिसका प्रयोजन है, वह सामायिक कहलाता है । मुनिवृत में सदा समता भाव धारण करना पड़ता है, इसलिये मुनियों के पंचविध चारित्र में सामायिक शब्द का प्रयोग हुआ है । परन्तु गृहस्थ सदा के लिये समता भाव धारण करने में असमर्थ है, अतः वह दिन में दो बार अथवा तीन बार दो घड़ी, वार घड़ी अथवा छह घड़ी के लिये समस्त पापों का परित्याग कर समता भाव धारण करता है। समय की अवधि से सहित होने के 'कारण उसकी यह क्रिया सामयिक शिक्षावृत कहलाती है। जितने समय की अवधि लेकर वह सामयिक में बैठा है, उतने समय के लिये वह पूर्ण मध्यस्थ रहता है । सुखदु:ख, वन्धु वर्ग-शत्रु संयोग वियोग आदि इष्टानिष्ट परिणतियों में उसे हर्ष विषाद नहीं होता । तथा पञ्च पापों का भी उतने समय के लिये पूर्ण त्यागी होता है । सुमन्त भद्र स्वामी ने इस प्रकरण सम्बन्धी समस्त श्लोकों में सामयिक शब्द का ही प्रयोग किया है। इससे जान पड़ता है, कि उन्हें शिक्षावृत का नाम इष्ट है, सामायिक नहीं । प्रश्न :- यहां पर जो समय शब्द कहा उसका स्वरूप क्या है ? उत्तर :- श्रागम के ज्ञाता पुरुष केश, मुट्ठी, वस्त्र बंध के काल को और - पालथी बांधने के काल को अथवा खड़े होने के काल को और बैठने के काल को सामायिक का समय जानते हैं । मूर्ध रुहमुष्टि वासो बन्धं पबन्धनं चापि । स्थानमुपवेशनं वा समयं जानन्ति समयज्ञाः ॥८३॥ मूर्य रूह, मुष्टि और वासस् इन तीन शब्दों का इन्द्व समास हुआ है | 'द्वान्ते इन्द्रादों वा श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बन्ध्यते' इस नियम के अनुसार यहां द्वन्द्व के अन्त में श्रूयमागा बन्त्र शब्द का सम्वन्ध प्रत्येक शब्द के साथ होता है । ग्रतः. मूर्व बन्च, मुष्टिबन्ध और बांसोबन्ध ये तीन शब्द विष्पन्न हुए हैं । बन्ध का अर्थ वन्ध काल है । इसी तरह पर्यबन्धन, स्थान और उपवेशन में और उनके काल का
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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