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________________ १५० ] [ गो. प्र. चिन्तामरि मर्यादित क्षेत्र में स्थित है, परन्तु राग की उसे दूसरे लोगों को मर्यादा के बाहर भेजकर अपना प्रयोजन सिद्ध करता है । यहाँ कृत की अपेक्षा व्रत की रक्षा होती है और कारित की अपेक्षा भंग हो जाता है । इस प्रकार भंगाभंग की अपेक्षा यह प्रेषण नाम का प्रतिचार है । स्वयं तो मर्यादा के भीतर स्थिर रहता है, परन्तु मर्यादा के बाहर काम करने वाले लोगों को खांस कर या खकार कर सावधान करता है, यह शब्द का अतिचार है । मर्यादा के बाहर फोन आदि करना भी इसी अतिचार के अन्तर्गत है । स्वयं भर्यादा के भीतर रहकर बाहर के क्षेत्र से किसी वस्तु को बुलवाना श्रानयन अतिचार है । तार या पत्र देकर यार्डर से वस्तु को बुलवाना भी इसी अतिचार में गर्भित है । स्वयं मर्यादा के क्षेत्र में स्थित रहकर मर्यादा के बाहर के लोगों को अपना रूप दिखाना, ऐसे स्थान पर बैठना जिससे मर्यादा के बाहर काम करने वाले लोग अपना रूप देखकर सावधानी से. काम करते रहें, यह रूपाभिव्यक्ति नाम का अतिचार है। टेलिविजन के द्वारा अपना चित्र प्रसारित करना भी उसी प्रतिवार के अन्तर्गत हैं। स्वयं मर्यादा के भीतर रहकर मर्यादा के बाहर काम करने वाले लोगों को कंकड, पत्थर आदि फेंककर सावधान. करना पुद्गल क्षेप नाम का प्रतिचार है । मर्यादा के बाहर पत्र भेजना भी इसी में गर्भित है | : प्रश्न :-- - सामायिक शिक्षात का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- आगम के ज्ञाता गंगाधर देवादिक सब और बाहर की सम्पूर्ण रूप से पांच पापों का किसी निश्चित को सामायिक नाम का शिक्षात कहते हैं । मुक्तिमुक्तं पञ्चाधानामशेषभावेन । सर्वत्र च सामयिक सामयिकं नाम शंसन्ति ॥८२॥ जगह मर्यादा के भीतर समय तक त्याग करने किसी समय की अवधि लेकर उतने समय तक मर्यादा और बाहर दोनों जगह : सम्पूर्ण रूप से हिंसादि पांच पापों का त्याग करना सामायिक नाम का शिक्षाव्रत| देशवाणिक व्रत में मर्यादा के बाह्य क्षेत्र में पांच पापों का त्याग होता है, मर्यादा के भीतर नहीं । परन्तु सामायिक शिक्षावृत में भीतर और बाहर दोनों जगह त्याग होता है । यतः उसकी अपेक्षा सामायिक शिक्षादूत में भेद है | श्लोक में कहलाता
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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