SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 201
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अध्याय : पांचवां ] [ १४६ सीमान्तानां परतः स्थूलेतर पञ्च पाप संत्यागात् । देशावका शिकेन च महाव्रतानि प्रसाध्यन्ते ॥८०॥ देशावकाशिक व्रत में जो क्षेत्र और काल की अपेक्षा सीमाएँ निर्धारित की गई हैं, उनके आगे हिंसादि पांच पापों का स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों प्रकार से परित्याग हो जाता है, इसलिये दिखत के समान देशावकाशिक व्रत के द्वारा भी महावतों की सावना की जाती है । विशेषार्थ --- क्षेत्र मर्यादा में जो गृह, छावनी आदि की मर्यादा ली थी तथा काल मर्यादा में जो संवत्सर आदि की मर्यादा निश्चित की थी; उन मर्यादायों के आगे गमन न होने से स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार से पांच पापों का परित्याग हो जाता है । इसलिये वहां अणुवृत धारियों के भी महावृत जैसी अवस्था हो जाती हैं । --- देशावकाशिक व्रत के प्रतिचारों का क्या स्वरूप है ? प्रश्न :--- उत्तर :---प्रेषण, शब्द, आनंयन, रूपाभिव्यक्ति और पुद्गलक्षेप ये पांच देशाकाशिक शिक्षावृत के अतिचार कहे जाते हैं । प्रेषण शब्दानयनं रूपाभिव्यक्ति पुद्गल क्षेपौ । देशावकाशिकस्य व्यपदिश्यन्तेऽत्ययाः पञ्च ॥८१॥ स्वयं मर्यादित देश में रहकर 'तुम यह काम करो' इस प्रकार कहकर दूसरे को मर्यादा के बाहर भेजना प्रेषण नाम का अतिचार है । मर्यादा के बाहर कार्य करने वाले कार्यकर्ता के प्रति खकार या खाँसी आदि शब्द करना शब्द नाम का प्रतिचार हूँ । मर्यादा के बाह्य क्षेत्र में रहने वाले लोगों को प्रयोजन वश यह आज्ञा देना कि तुम ग्रमुक वस्तु लाओ आनयन नाम का प्रतिचार है। स्वयं मर्यादित क्षेत्र के भीतर स्थित रहकर बाह्य क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को अपना शरीर दिखलाना रूपाभिव्यक्ति नाम का प्रतिचार है और उन्हीं लोगों को लक्ष्य कर कंकड़ पत्थर आदि फेंकना पुद्गल क्षेप नाम का प्रतिचार है | देशावकाशिक व्रत के ये पांच प्रतिचार हैं । विशेषार्थ -- व्रत धारण करने का मूल प्रयोजन रागादि भावों का नियन्त्रण प्राप्त करना है । जहाँ इन भावों का नियन्त्रण नहीं हो पाता है, वहाँ व्रत निर्दोष नहीं पलता है उसमें अनेक दोष लगने लगते हैं। उन दोषों का नाम ही अतिचार है ।. देशाकाशक व्रत के अतिचारों का वर्णन इस प्रकार है-किसी ने नियम लिया कि मैं इतने समय तक इस स्थान से यागे नहीं जाऊँगा । नियम के अनुसार वह अपने
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy