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। गो. प्र. चिन्तामणि बनाये जाते थे । सीमा निर्धारित करते समय योजन के स्तम्भों की भी सीमा निश्चित की जाती थी। आजकल उसके स्थान पर मील के पत्थर की सीमा निश्चित की जा सकती है।
प्रश्न :-देशावकाशिक व्रत में कालावधि का प्रतिपादन किस प्रकार है ?
उत्तर :- गणधर देवादिक बुद्धिमान् पुरुष एक वर्ष एक ऋतु - दो माह, एक अयन - छह माह, एक माह, चार माह, एक पक्ष - पन्द्रह दिन और एक नक्षत्र में को देशावकाशिक व्रत की काल की मर्यादा कहते हैं।
संवत्सरमृतुमयनं मास 'चतुर्माप्त पक्ष मृक्षं च ।। देशावकाशिकस्य प्राहुः कालावधि प्राज्ञाः ।।७६॥
देशाबकाशिक व्रत में काल को मौदा बताते हुए गगाधर देवादिक में एक वर्ष, एक ऋतु, एक अमन, एक माह, चार माहू, एक पक्ष अथवा एक नक्षत्र को कालावधि कहा है । अर्थात् संवत्सर आदि की सीमा लेकर देशावकाशिक व्रत में यातायात का क्षेत्र निश्चित किया जाता है। ऋक्ष नक्षत्र दो प्रकार के होते हैं--- एक चन्द्र भुक्ति की अपेक्षा और दूसरे सूर्य भुक्ति की अपेक्षा । चन्द्र भुक्ति की अपेक्षा, अश्विनी, भरगी आदि नक्षत्र प्रतिदिन बदलते रहते हैं, अर्थात् एक दिन में एक नक्षत्र रहता है और सूर्य भुक्ति की अपेक्षा एक वर्ष में अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्र कम से । परिवर्तित होते हैं । संवत्सर ग्रादि का अर्थ स्पष्ट है।
. विशेषार्थ :--देशावकाशिक व्रत के क्षेत्र की अवधि का वर्णन पूर्व श्लोक में किया गया था, यहाँ काल की अवधि का वर्णन किया गया है । उसे इस प्रकार । समझना चाहिये कि मैं एक वर्ष तक, अथवा अमुक ऋतु - दो माह तक, एक अयन - छह माह तक, एक माह तक, चार माह तक, एक पक्ष तक अथवा अमुक नक्षत्रं तक इस स्थान से आगे नहीं जाऊँगा । इस प्रकार समय की सीमा निश्चित करना चाहिये । दिग्बत जीवन पर्यन्त के लिये होता है, परन्तु देशावकाशिक अत समय की मर्यादा लेकर धारण किया जाता है ।
प्रश्न :---देशाधकाशिक व्रत के लेने पर मर्यादा के आगे क्या होता है ?
उत्तर :-सीमाओं के अन्त भाग के पागे स्थूल और सूक्ष्म पाँचों पापों का सम्पक प्रकार त्याग हो जाने से देशावकाशिक प्रत के द्वारा भी महानत सिद्ध किये जाते हैं।