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________________ सा है । अध्याय : पांचवां ] [ १४७ देशावकाश जिम प्रत का प्रयोजन है, उसे देशावकाशिक व्रत कहते हैं । दिश्वत नामक गणव्रत में जीवनपर्यन्त के लिये जो विशाल क्षेत्र निश्चित किया था, उसमें एक दिन, एक पहर आदि काल की मर्यादा लेकर और भी संकोच करना देशावकायिक शिक्षाबत कहलाता है । वह ब्रत प्रण अत के धारक श्रावको के होता है । 'मानि शागि तानि येषां ते अणुवताः तेवाम्' इस प्रकार समास करने से ग्राणुव्रत का अर्थ श्रावक हो जाता है । . विशेषार्थ :-श्रावक को प्रतिदिन प्रातःकाल समय की अवधि लेकर अपने यातायात की सीमा निश्चित करना चाहिये, क्योंकि दिग्धत का क्षेत्र जीवनपर्यन्त के लिये होने से विस्मृत होता है । उतने विस्तृत क्षेत्र में प्रतिदिन गमन नहीं होता। इसलिये अपनी उस दिन की आवश्यकताओं को देखकर विस्तृत क्षेत्र को संकुचित कर देना चाहिये । प्रश्न :----देशवकाशिकवत में किस प्रकार मर्यादा की जाती है ? उत्तर :-गणधर देवादिक चिरन्तन प्राचार्य घर, छावनी, गांव और खेल, नदो, वन तथा योजनों को देशावकाशिक शिक्षानत की सीमा स्मरण करते हैं। गृह हारिमामा क्षेत्र नदीवावयोजनानां च । देशवकाशिकस्य स्मरन्ति सीनां तपोवृद्धाः ।।७।। 'तपसा वृद्धास्तपोवृद्धाः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो तुप से वृद्ध हैं, ऐसे गणधर देवादिक चिरन्तन-... प्राचीन प्राचार्यों का ग्रहण होता है। उन्होंने देशावकाशिक जत की सीमाय बतलाते हुए मर्यादा के रूप में घर, छावनी, ग्राम, खेत, नदी, वन अश्वया योजन का सीमारूप में स्मरण किया है । 'सीम्नाम्' यहाँ पर कर्म अर्थ में स्मृत्यर्थदयेशां कर्म' इस मूत्र से पाठी विभक्ति का प्रयोग हुआ है । मूत्र का अर्थ इस * प्रकार है-स्मृत्यर्थक धातुएँ तथा दय और ईश धातु के कर्म में. षष्टी विभक्ति होती है। विशेषार्थ :- मैं अाज अमुक महानुभाव के घर तक जाऊँगा, मैं अाज नगर में बनी हुई छावनी तक जाऊंगा, मैं आज अमुक गांव तक जाऊँगा, मैं अाज अमुक वन तक जाऊँगा गीर मैं आज इतने योजन तक जाऊँगा, इस प्रकार का नियम प्रतिदिन श्रावक को करना चाहिये । चार कोश का एक योजन होता हैं। जिस प्रकार आजकल मार्ग में माइलस्टोन ----मील के पत्थर गड़े रहते हैं, उसी प्रकार पहले योजन के स्तम्भ
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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