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[ गो. प्र. चिन्तामणि विशेषार्थ :--'शिक्षायै वृतं शिक्षावृतम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार मुनिवृत की शिक्षा के लिये जो वृत होते हैं, उन्हें शिक्षावृत कहते हैं । शिक्षाबत चार हैं, इस विषय में तो सर्व प्राचार्य सहगत है । परन्तु उनके नाम निरिण में प्राचार्यों के विभिन्न मत हैं । सर्वप्रथम कुन्दकुन्द स्वामी ने १. सामायिक, २. प्रोषध, ३. अतिथिपूजा और ४. सल्लेखना इन बार को शिक्षाबत माना है । उमास्वामी ने १. सामायिक, २. प्रोपधोपवास, ३. भोगोपभोग परिमारण और ४. अतिथि विभाग इन चार को शिक्षाक्तः कहा है । समन्त भद्र स्वामी ने १. देशावकाशिक, २. सामायिक, ३. प्रोपधोपवास, और ४. वैयावृत्य इन चार को शिक्षाकत में परिगणित किया है । प्राचार्य वसुनन्दी ने १. भोगपरिमारण, २. उपभोग परिमाया, २. अतिथि संविभाग, ४. सल्लेखना इन चार
को शिक्षानत माना है। चूंकि सामायिक और प्रोषध को तृतीय और चतुर्थ प्रतिमा .. का रूप दिया गया है, इसलिये वसुनन्दी ने इन्हें शिक्षायतों में शामिल नहीं किया है ।
ऋन्दकुन्द स्वामी ने देशाबकाशिका (देशनत) का वर्णन मुग्णनत में किया है। इसी प्रकार समन्तभद स्वामी ने भोगोपभोग परिमारंगबस को भी गुरगनतों में सम्मिलित किया है । कुन्दकुन्द स्वामी की सल्लेख ना को शिक्षानत मानने सम्बन्धी मान्यता अन्य : प्राचार्यों को संमत नहीं हुई, बयोंकि सल्लेबना मरण काल में ही धारण की जा सकती है और शिक्षानत सदा धारण किया जाता हैं । इसी दृष्टि से अन्य प्राचार्यों ने सल्लेखना का वर्णन बारहमतों के अतिरिक्त किया है । इसके स्थान पर उमास्वामी ते अतिथि संविभाग और समन्तभद्र ने बैवावृत्य को शिक्षाबत स्वीकृत किया है, वैयावृत्य, अतिथि संविभाग व्रत का ही विस्तृत रूप है । कुन्दकुन्द स्वामी ने मल्लेख ना को जो शिक्षाधत में सम्मिलित किया है, उसमें उनका अभिप्राय सल्लेखना की भावना से जान पड़ता है, अर्थात् शिक्षाअत में सदा ऐसी भावना रखना चाहिये कि मैं जीवनान्त में सल्लेखना से मरणा कह । ऐसी भावना सदा रक्सी जा सकती हैं।
प्रश्न :----देशवकाशिक शिक्षावत का क्या लक्षण है ?
उत्तर : -- अणुनत के धारक धावकों का प्रतिदिन समय की मर्यादा के द्वारा देश का संकोच किया जाना देशावकाशिक नल होता है ।
देशावकाशिकं स्यात्काल परिच्छेदनेन देशस्य । प्रत्यहमणुक्तानां प्रतिसंहारो विशालस्य ।।७७।। मर्यादित. देश में नियतकाल तक रहना देशावकाश कहलाता है । या
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