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अध्याय : पाँचवाँ ।
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वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी सौन्दर्य जनित सुख का साधन होने से विषयों का बार-बार स्मरण करना यह अनुस्मृति नाम का अतिचार है । अत्यन्त आसक्ति का कारण होने से यह अतिचार माना जाता है । विषयों में अत्यन्त गुद्धता रखना अर्थात् विषयानुभव से वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी बार-बार उसके अनुभव की अाकांक्षा रखना अतिलौल्य नाम का अतिचार है । आगामी भोगोपभोग आदि की अत्यधिक गृढता के साथ प्राप्ति की आकांक्षा रखना अतितृषा नाम का अतिचार है ! और नियतकाल में भी जब भोग और उपभोग का अनुभव करता है, तब अत्यन्त आसक्ति से करता है, वेदना के प्रतिकार की भावना से नहीं, यह अत्यनुभव नाम का अतिचार है।
विशेषार्थ :-तत्त्वार्थ सूत्रकार उमास्वामी महाराज ने भोगोपभोग परिमारण वत के सचित्ताहार, सचित्त सम्बन्धाहार, सचित्तसंमिचाहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये पांच अतिवार निरूपित किये हैं। भोग और उपभोग की वस्तुएँ अनेक हैं, अतः सबसे सम्बद्ध अतिचारों को दिदी शम्मद जाए उन्होंने मात्र भोजन सम्बन्धी अतिचारों का वर्णन किया है। उपलक्षण से अन्य भोगोपभोग सम्बन्धी अतिचारों की अोर संकेत किया है। परन्तु समन्तभद्र स्वामी ने भोगोपभोग सामान्य को लक्ष्य में रखकर अतिचारों का वर्णन किया है । अनुप्रेक्षा, अनुस्मृति, अतिलौल्य, अतितृषा और अत्यनुभव इनका सम्बन्ध प्रत्येक भोग उपभोग के साथ होता है । अनुप्रेक्षा आदि अतिचार क्यों हैं ? इसका स्पष्टीकरण टीकार्य में किया जा चुका है।
* शिक्षावत* प्रश्न :--शिक्षाव्रतों के नाम कौनसे हैं ?
उत्तर :--देशावकाशिक, सामायिक, प्रोषधोपवास और वैयावृत्य ये चार शिक्षाबूत कहे गये हैं।
देशावकाशिकं वा सामायिक प्रोषधोपवासो वा। वैयावृत्यं शिक्षाब्रतानि चत्वारि शिष्टानि ॥७६।।
श्लोक में जो 'वा' शब्द है, वह परस्पर के समुच्चय अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । शिक्षावृत के चार प्रकार कहे गये हैं.....१. देशावकाशिक, २. सामायिक, ३. प्रोषधोपवास और ४. यावृत्य ! इन सबके स्वरूप ग्रन्धकार स्वयं ही आगे कहेंगे।