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| गो. प्र. चिन्तामणि
दो मास को ऋतु कहते हैं । एक वर्ष में चैत्र और वैशाख से लेकर दो-दो मासों में क्रम से वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त और शिशिर ये छह ऋतुएँ होती है । उत्तरायण और दक्षिणायन के भेद से वर्ष में छह-छह मास के दो ग्रयन होते हैं । इस प्रकार समय की अवधि रखकर भोजन यादि का त्याग करना नियम कहलाता है । विशेषार्थ :- - मैं आज एक बार या दो बार भोजन करूँगा, आज सवारी पर नहीं बैठूंगा, ग्राज पलंग पर नहीं सोऊँगा, आज एक बार ही स्नान करूंगा, श्राज शरीर में विलेपन नहीं लगाऊँगा, श्राज फूलों की माला नहीं पहनू गा, ग्राज पान बिलकुल नहीं खाऊँगा ग्रथवा इतने परिमाण में खाऊँगा, आज दो वस्त्र अथवा चार, पांच यादि वस्त्र पहनूंगा, ग्राज आभूषण नहीं पहनू गा अथवा इतने आभूषण पहनूंगा, आज काम सेवन नहीं करूंगा, आज संगीत में शामिल नहीं होऊंगा और बाज गीत बन्द रखूंगा । इस प्रकार काल का परिमाग रखकर जो त्याग किया जाता है। वह नियम कहलाता है । और इन्हीं वस्तुओं का जीवन पर्यन्त के लिये जो त्याग होता. है, वह यम कहलाता है ।
प्रश्न : - भोगोपभोगपरिमारगवत के प्रतिचारों का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :- विषय - रूपी विष से उपेक्षा नहीं होना अर्थात् उसमें श्रादर रखना, भोगे हुए विषयों का बारम्बार स्मरण करना वर्तमान विषयों में अधिक लम्पटता रखना आगामी विषयों की श्रविक तृष्णा रखना और वर्तमान विषय का अत्यन्त - आसक्ति से अनुभव करना ये पांच भोगोपभोग परिमाण वृत के प्रतिचार कहे जाते हैं ।
विषय विषतोऽनुपेक्षानुस्मृति रति लौल्यमतितृषाऽनुभवी । भोगोपभोग परिमाणव्यतिक्रमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥१७५॥
विषय के समान हैं, क्योंकि जिस प्रकार विष, प्राणियों को दाह तथा संताप यादि कराता है, उसी प्रकार विषय भी प्राणियों को दाह और संताप आदि • उत्पन्न कराते हैं । इस विषय रूपी विष से उपेक्षा नहीं होना अर्थात् उनके प्रति श्रार का भाव बना रहना अनुप्रेक्षा नाम का प्रतिचार है । विषयों का अनुभव - उपभोग विषय सम्बन्धी वेदना के प्रतिकार के लिये किया जाता है, सो विषयानुभव से वेदना का प्रतिकार हो जाने पर भी फिर से संभाषण तथा लिन आदि में जो आदर वह प्रत्यन्त श्रासक्ति का जनक होने से प्रतिचार माना जाता है। विषयानुभव