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अध्याय : पांचवां ]
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है और जो जीवन पर्यन्त के लिए धारण किया जाता है, वह यम कहलाता है । विशेषार्थ -- जो वस्तुएँ ऊपर कहे हुए पाँच प्रकार के मध्य की कोटि में आती हैं, उनका तो यम रूप से त्याग करना चाहिए अर्थात् जीवन पर्यन्त के लिए त्याग करना चाहिए और जो ग्रभक्ष्य की कोटि में नहीं श्राती हैं, उनका अपने परिमाण तथा देश-काल की योग्यता देखते हुए नियम और यम दोनों रूप से त्याग किया जाता है 1
प्रश्न :-- भोगोपभोग परिमाण व्रत में परिमित काल वाला जो नियम रूप त्याग है, वो कैसे ?
उत्तर : - भोजन, सवारी, शमन, स्नान, पवित्र ग्रङ्गविलेपन, पुष्प, पान, वस्त्र, आभूषण, काम सेवन, संगीत और गीत के विषय में आज, एक दिन, एक रातअथवा एक पक्ष, एक साह और एक ऋतु दो माह प्रथवा एक छह माह इस प्रकार समय के विभाग पूर्वक त्याग करना नियम होता है ।
भोजन वाहन शयन स्नान पवित्राङ्ग राग कुसुमेषु । ताम्बूल वसन भूषरण मन्मथ संगीत गीतेषु ॥७३॥ ॥ अद्य दिवा रजनी व पक्षों मासस्तयतुं रथनं वा । इति काल परिच्छित्या प्रत्याख्यानं भवेन्नियमः ||७४ ||
भोजन का अर्थ प्रसिद्ध है, घोड़ा यादि को बाहन कहते हैं, पलंग यादि को शयन कहते हैं, स्नान का अर्थ प्रसिद्ध है, अपवित्र वस्तुनों के सम्पर्क से रहित केशर • आदि के विलेपन को पवित्रा राग कहते हैं, यह ग्रङ्गराग अञ्जन तथा तिलक यादि का उपलक्षण है । अङ्गराग के साथ जो पवित्र विशेपर दिया गया है, वह दोषों को दूर करने के लिए दिया गया है । इसलिए सदोष श्रौषध तथा अंगराग का निराकरण होता है । कुसुम का अर्थ प्रसिद्ध है, ताम्बूल पान को कहते हैं, वसन वस्त्र को कहते हैं, कटक यादि को भूचरण कहते हैं काम सेवन को मन्मथ कहते हैं, जिसमें गीत, नृत्य और वादित्र में तीनों होते हैं, उसे संगीत कहते हैं और जिसमें केवल गीत होता है, नृत्य और वादित्र नहीं होते, उसे गीत कहते हैं । इन सबके विषय में समय की अवधि लेकर जो त्याग होता है, वह नियम कहलाता है । जिस दिन में एक घड़ी, एक पहर आदि काल का परिमाण कर त्याग करना आज का त्याग है। दिन और रात्रि अर्थ स्पष्ट है पन्द्रह दिन को पक्ष कहते हैं। तीस दिन को मास कहते हैं ।
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