________________
१४२ ]
[ भो. प्र. चिन्तामरिए
योग्य न हो वह भी छोड़े क्योंकि योग्य विषय में अभिप्राय पूर्वक की हुई निवृत्ति वृत होती है ।
यद निष्ठ तव द्यच्चानुपसेव्य मेतदपि जह्यात् । श्रभिसन्धिकृता विरति विषय द्योंग्यावतं भवति ॥ ७१ ॥
जो वस्तु प्रासुक होने पर भी अनिष्ट है अर्थात् उदरशूल यादि का कारण होने से प्रकृति के अनुकूल नहीं है, उसे छोड़ना चाहिए। इसी प्रकार जो भी गोमूत्र, ऊँटनी का दूध, शङ्ख चूर्ण पान का उगाल, लार, मूत्र, पुरीष तथा खकार आदि वस्तुएँ अनुसेव्य हैं— विष्ट मनुष्यों के सेवन करने योग्य नहीं हैं, उन्हें भी छोड़ना चाहिए, क्योंकि अनिष्टपन और अनुसेन्यपन के कारण छोड़ने के योग्य हैं । विषय से अभिप्राय पूर्वक जो निवृत्ति होती है, वह व्रत कहलाता है ।
विशेषार्थ - मनुष्य को प्रकृति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है । कोई वस्तु किसी के लिए लाभ दायक है और किसी के लिए हानिकारक है इस तरह जो वस्तु जिसके लिए हानिकारक हो वह प्रामुक त्रस स्थावर के घात से रहित होने पर भी अनिष्ट कहलाती है । व्रती मनुष्य को इनका त्याग करना चाहिए | इसी प्रकार जो वस्तुएँ शिष्ट मनुष्यों में सेवन में नहीं आती हैं, वे अनुसेव्य हैं । प्रती मनुष्य को इनका भी त्याग करना चाहिए, क्योंकि योग्य विपय का अभिप्राय पूर्वक त्याग किया जाता है, वही व्रत कहलाता है । इस प्रकार व्रती मनुष्य को १ बस चात, २. बहुघात, ३. प्रमादवर्धक, ४. अनिष्ट और ५ अनुसेव्य इन पाँच प्रकार के अभक्ष्यों का त्याग.. करना चाहिए।
प्रश्न : --- परिग्रह त्याग दो प्रकार का कैसे है . ?.
1
उत्तर :---- -भोग और उपभोग के परिमाण का आश्रय कर नियम और यम दो प्रकार से व्यवस्थापित है-प्रतिपादित हैं । उनमें जो काल के परिमाण से सहित हैं, वह नियम है और जो जीवन पर्यन्त के लिए धारण किया जाता है, वह यम कहलाता है ।
नियमो यमश्च विहितौ द्वधा भोगोपभोगसंहारात् ।
नियमः परिमित कालो यावज्जीवं यमो नियते ॥७२॥
• भोग और उपभोग का परिमाण नियम और यम के भेद से दो प्रकार का होता है । जो परिमाण समय की अवधि से लेकर किया जाता है, यह नियम कहलाता