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अध्याय : पांचवां ]
[ १६६ - उच्च गोत्रं प्रणते गो दानादुपासनात्पूजा ।
भक्तेः सुन्दर रूप स्तवनात्कोतिस्तपोनिधिषु ।।१००।
तपस्वियों को प्रणाम करने से उच्च गोत्र; दानादिक देने से भोग, पड़गाहने से पूजा-प्रभावना, भक्ति अर्थात् गुणानुराग से उत्पन्न श्रद्धा विशेष से सुन्दर रूप, तथा 'ग्राप ज्ञान के सागर हैं' इत्यादि स्तुति करने से कीति प्राप्त होती है। ..... विशेषार्थ :-जिस कुल में मोक्ष मार्ग-मुनिमार्ग का प्रचलन हो, उसे उच्च गोत्र कहते हैं, ऐसा उच्च गोत्र मुनियों को प्रणाम करने से प्राप्त होता है। सुन्दर एवं सुखदायी भोजन आदि को भोग कहते हैं । इसकी प्राप्ति मुनियों को ग्राहारादि दानों के देने से होती है । सर्वत्र सम्मान का होना पूजा कहलाती है। इसकी प्राप्ति मुनियों की उपासना-पड़गाहना आदि नवधा भक्ति करने से होती है। गुरणों के अनु-. राग से अन्तरंग में जो श्रद्धा उत्पन्न होती है, उसे भक्ति कहते हैं। मुनियों की ऐसी भक्ति करने से भुन्दर रूप प्राप्त होता है। तथा दिदिगन्त लक फैलने वाले सुयश को कोति कहते हैं । इस कीर्ति को प्राप्ति मुनियों के स्तवन से होती है।
प्रश्न :-थोडा सा दान विशिष्ट फल कैसे प्राप्त कराता है ? .. उत्तर :-~उचित समय में योग्य पात्र के लिये दिया हुआ थोड़ा भी दान उत्तम पृथ्वी में पड़े हुए वट वृक्ष के बीज के समान प्राणियों के लिये माहात्म्य और वैभव से युक्त, पक्ष में छाया की प्रचुरता से सहित बहुत भारी अभिलषित फल कों फलता है-देता है। . .
क्षितिगतमिव बट बीजं पात्र मतदानमल्पमपि काले । फलति उछायाविभवं बहु फल मिष्टं शरीरभृताम् ।।१०१॥
जिस प्रकार उत्तम भूमि में उचित समय में डाला हुअा छोटा-सा बट का .. वीज संसारी जीवों के बहुत भारी छाया के साथ बहुत से इष्ट फल को फलता है, उसी प्रकार उचित समय में सत्पात्र के लिये दिया हुआ थोड़ा भी दान संसारी प्राणियों के लिये अभिलषित सुन्दर रूप. तथा भोगोपभोग आदि अनेक प्रकार के फल को प्रदान करता है । दान पक्ष में 'छाया-विभव' का समास इस प्रकार होता है-'छाया महात्म्यं विभवः सम्पत् तो विद्यते यस्मिन् इति फलस्य विशेषरगं छाया का अर्थ महात्म्य होता है; और विभव का अर्थ सम्पति होता है। छाया और माहात्म्य ये दोनों जिस फल में विद्यमान है, · दान उस फल को देता है । वंट बीज पक्ष में छाया का अर्थ