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________________ [ गो. प्र. चिन्तामरिश अनातप--घाम का प्रभाव होता है और विभव का अर्थ प्राचुर्य--अधिकता लिया जाता है । 'छाया-पातप निरोधिनी तम्या विभवः प्राचुर्य यथाभवत्येवं' इस प्रकार क्रियाविशेषरा किया जाता है । .. विशेषार्थ :--अधिक परिमारग में दिया हुया दान ही सफल होता हो यह.. यावश्यक नहीं है। किन्तु योग्य पात्र के लिए योग्य समय में दिया हुआ थोड़ा सा दान भी अधिक फल देता है । इस विश्व में वट बीज का दृष्टान्त बहुत उपयुक्त है। अर्थात् जिस प्रकार वटं का छोटा-सा बीज यदि योग्य समय में अच्छी भूमि में डाल दिया जाता है तो वह आगे चलकर बहुत भारी छाया के साथ अनेक इष्ट फल प्रदान करता है। उसी प्रकार सत्पात्र के लिए. योग्य काल में यदि थोड़ा भी दान दिया जाता है तो यह आगे चलकर बहुत भारी माहात्म्य और सम्पत्ति के साथ अनेक फल प्रदान करता है। इससे सिद्ध है कि दान में परिमाण की अपेक्षा भावना का विशिष्ट फल है। दान के विषय में पात्र का विचार अवश्य रखना चाहिये । पान उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से तीन प्रकार का होता है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के धारक भुनि उत्तम पात्र हैं, श्रावक मध्यंग पात्र है तथा अविरति सम्यग्दृष्टि गृहस्थ जघन्य पात्र है। मिथ्यादर्शन के साथ जो जैन प्राचार का पालन करता है, वह कुपात्र कहलाता है तथा मिच्यादर्शन के साथ जो मिथ्याचार का पालन करता वह अपात्र कहलाता है। सम्यग्दृष्टि मनुष्य पात्र दान के फलस्वरूप स्वर्ग में उत्पन होता है और मिथ्यादृष्टि मनुष्य भोग भूमि में उत्पन्न होता है। कुपात्र दान का फम कुभोग भूमि है और अपात्रदान का फल नरक-निगोदादिक है । . प्रश्न :-दान कितने प्रकार का है ? उत्तर :-विद्वज्जन श्राहार, औषध और उपकरण तथा श्रावास के भी दान से बैयाबृत्य को चार प्रकार का कहते हैं। ...... . आहारौषधयोरप्युकरणावासयोश्च दानेन । '.. यावृत्यं अक्ते चतुरात्मत्वेन चतुरस्त्राः ॥१०२॥ भक्त पान आदि को आहार कहते हैं, वीमारी को दूर करने वाले पदार्थ को गोप, कहते हैं, ज्ञानोपकरण प्रादि को उपकरण कहते हैं और वसतिका आदि को अावास कहते हैं । इन चारों वस्तुओं को देने से वैयावृत्य चार प्रकर का होता है। . ऐसा पाणिततजन निरूपण करते हैं।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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