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अध्याय : पांचयां ।
[ १७१ :- विशेषार्थ :-वैयावृत्य का प्रचलित अर्थ दान है. और वह दान चार प्रकार वा है--१.. पाहारदान, २. औषधदान, ३. उपकरणदान, ४. पावासदान । अन्य शास्त्रकारों ने उपकरण दान के स्थान पर ज्ञान दान और प्रावास दान के स्थान पर अभयदान का उल्लेख किया है। परन्तु ज्ञान दान की अगेक्षा उपकरण दान अधिक व्यापक जान पड़ता है, क्योंकि ज्ञान दान में मात्र ज्ञान के उपकरणा-शास्त्रों का दान गभित होता है जबकि उपकरण दान में संयम का उपकरण-मयूरपिच्छ का तथा शौच का उपकरण-कमण्डलु का दान भी गर्भित हो जाता है। यद्यपि यात्रासदानवसलिका का दान, अभयदान का ही एक रूप है तथापि इसकी अपेक्षा पाबासदान जद अधिक व्यापक जान पड़ता है। पूज्यपाद तथा अकलंक स्वामी ने भिक्षा, प्रौपध उपकरण तथा प्रतिश्रय के भेद रो अतिथि संविभाग व्रत के चार भेद माने हैं, जो कि समन्तभद्राचार्य के द्वारा निरूपित चार भेदों के अनुरूप ही है ।
प्रश्न :-..-वह चार प्रकार का दान किस किस के द्वारा दिया गया?
उत्तर :--श्रीपेरण, वृषभसेना, कौण्डेश और मुकर ये चार भेद बाले वैयावृत्य के दृष्टान्त मानने के योग्य हैं। ...
श्रीधेरणवृषभसेने कौण्डेशः मुम्हरश्च दृष्टान्ताः । . वैयावृत्तस्यैले चतुविकल्पस्य मन्तव्याः ।।१०३।।
श्रीपेगा राजा बहारदान, बृपभसेना औषधदान, कौण्डेश उपकरणदान और गुकर पायासदान के दृष्टान्त हैं, ऐसा जानना चाहिये। ..
प्रश्न :- क्या वयावृत्य करने वाले श्रावक को दान और पूजा भी करना चाहिये ?
उत्तर :-श्रावक को आदर से युक्त होकर प्रतिदिन मनोरथों को पूर्ण करने वाले और काम को भस्म करने वाले अरहन्त भगवान के चरणों में समस्त दुःखों को दूर करने वाली पूजा करना चाहिये।
देवाधिदेव चरणे परिचरणं सर्व दुःख निर्हरणम् । कामदुहि कामदाहिनि परिचिनुयादाढतो नित्यम् ॥१०४॥....
इन्द्रादिक देवों के हारा वन्दनीय रहन्त भगवान देवाधिदेव कहलाते हैं। उनके चरण वाञ्छित फल को देने वाले हैं तथा काम को भस्म करने वाले हैं। श्रावक को चाहिये कि वह अादर पूर्वक प्रतिदिन. उनके चरणों की पूजा करे, क्योंकि