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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि - १७२ ] उनकी पूजा समस्त दुःखों को हरने वाली है । विशेषार्थ :- गृहस्थ के छह ग्रावश्यक कार्यों में देव पूजा का प्रमुख स्थान है 1. पूजा करते समय पूज्य पूजक, पूजा और पूजा के फल का विचार करना चाहिये | जिसने कामादिक विकास भावों की भस्म कर दिया है ऐसे बीतरांग जिनेन्द्रदेव पूज्य हैं | उपलक्षण से उपर्युक्त विकारी भावों को ग्रांशिक रूप से नष्ट करने वाले निर्ग्रन्थ गुरु तथा सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति में सहायक होने से समीचीन शास्त्र भी पूज्य हैं । यद्यपि ये सब पूजा से प्रसन्न होकर किसी का कुछ नष्ट नहीं करते हैं. तथापि 'कामदुह' मनोरथों को पूर्ण करने वाले कहे जाते हैं । उसका कारण यह है कि इनकी पूजा के काल में पुजा करने वाले मनुष्य के हृदय में जो शुभ रागं उत्पन्न.. होता है, उसके फलस्वरूप पुण्यकर्म का बन्ध होता है और पाप कर्म का अनुभाग क्षीण होता है, इसलिए सुख की प्राप्ति और दुःख का नाश स्वयमेव हो जाता है । उनके गुरणों में जिसे अत्यन्त आदर का भाव है. वह पूजक कहलाता है । परिचर्या, सेवा, उपासना को पूजा कहते हैं और समस्त दुःखों का दूर होना पूजा का फल है । यहाँ प्राचार्य ने 'कामदुहि कामदाहिनि देवाधिदेवचरणे' इन पदों के द्वारा पूज्य का वर्णन करते हुए कहा है कि पूज्य वही हो सकता है जो मनोरथों को पूर्ण करने वाला हो: तथा कामादिक विकारी भावों को भस्म करने वाला हो । पूजक का वर्णन करते हुए 'आता' इस विशेषण द्वारा प्रकट किया है कि पूजक वही हो सकता है जो के. पूज्य गुणों में अत्यन्त आदर भाव रखता है। पूजा का वर्णन करते हुये 'परिचरण' शब्द द्वारा प्रकट किया है कि देव, शास्त्र तथा गुरु की उनकी पद के अनुरूप परिचर्या करना अर्थात् प्रतिमारूप देव की अभिषेक तथा पूजन करना, शास्त्रों की विनय करते हुये उनकी सुरक्षा तथा उनके द्वारा प्रतिपाद्य तत्वों का प्रचार करना और निर्ग्रन्थ गुरुयों की पूजा करते हुये उनकी माहारादि की व्यवस्था करना यह सब पूजा के कहलाती है। और पूजा के फल का वर्णन करते हुये 'सर्व दुःख निर्हरणम्' इस पंद द्वारा प्रकट किया है कि पूजा सब दुःखों को सम्पूर्ण रूप से नष्ट करने वाली है। सम्यग्दृष्टि पुरुष भगवान् जिनेन्द्र की पूजा करते समय यह भाव रखता है कि है भगवन् ! जैसी शान्त निर्विकार मुद्रा श्रापकी है वैसी ही मेरी स्वभाव है । परन्तु मैं स्वभाव को भूलकर विभाव रूप परिणमन के दुःख उठा रहा हूँ। आपकी पूजा के फलस्वरूप में यही चाहता हूँ कि मैं स्वकीय मुद्रा है, यह मेरा करता हुआ संसार
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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