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अध्याय : पांचवां ]
। १७३ गद्ध स्वभाव में स्थिर रह । इन्द्र, चक्रवर्ती आदि के पद की मुझं, चाह नहीं है, उन्हें तो में अनन्त बार प्राप्त कर चुका हूँ। उपर्युक्त शुद्ध भावों से की हुई पूजा, परिणामों में अत्यन्त अाह्वाद उत्पन्न करती है । पुण्य बन्ध तो उससे होता ही है यदि कुछ समय के लिए स्वरूप समावेश हो गया तो निर्जरा का भी कारण हो जाती है। जो मनुष्य निश्चल भाव से जिस किसी भी विधि से भगवान की पूजा करता है तो उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं और दिशाएं उसकी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं अर्थात् जहाँ जाता है, वही उसकी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
प्रश्न :- पूजा का फल किस किसको मिला? . उत्तर :---हर्ष से प्रमत्त मेढ़क ने राजगृह नगर में एक पुष्प के द्वारा भव्य जीवों के आगे अर्हन्त भगवान् के चरणों की पूजा का माहात्म्य प्रकट किया था। .
अर्हचचरण सपर्या महानुभावं. महात्मनामवदत् । अकः प्रमोदमत्तः. कुसुमेनकेन राजगृहे ।।१०।।
विशिष्ट धर्मानुराग से हर्षित हुए मेढ़क ने राजगृह नगर में भव्य जीवों को बतलाया था कि एक फूल से ही अर्हन्त देव के चरणों की पूजा करने का क्या फल होता है 1
* वैयावृत्य के अतिचार * वेयावत्य के अतिचारों का वर्णन ।
निश्चय से हरित पत्र प्रादि से देने योग्य वस्तु को ढकना तया हरित पत्र प्रादि पर देने योग्य वस्तु को रखना, अनादर, अस्मरणा और मत्सरत्व में पाँच बयावृत्य के अतिचार कहे जाते हैं।
हरितविधान निधाने ह्यनादरास्मरण मत्सरत्वानि । ... वैयावृत्त्यस्यैते त्यतिकमाः पञ्च कथ्यन्ते ॥१०॥
हरे कमलपत्र आदि से आहार को ढाकना हरितपिधान लाम का अतिचार है। हरे कमल पत्र आदि पर अाहार को रखना हरितनिधान नाम का अतिचार है। देते हुए भी आदर का अभाव होना अनादर कहलाता है। माहारादि दान इस समय ऐसे पात्र के लिए देना चाहिये अथवा देने योग्य वस्तुओं में यह वस्तु दी है अथवा नहीं दी है । इस प्रकार की स्मृति का अभाव होना अस्मरण कहलाता है और अन्य