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गो. प्र. चिन्तामगि
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दाता के दान तथा गुगों के विषय में असहनशीलता का होना मत्सरत्व कहलाता है। ये पांच यावृत्य शिक्षाबत के अतिचार कहे जाते हैं।
विशेषार्थ :-यहां चार प्रकार के दानों में आहारदान की मुख्यता से अतिचारों का वर्णन किया जाता है । मुनि सचित वस्तु के त्यागी होते हैं, अतः उन्हें अचिन-प्रासुका वस्तु ही दी जाती है। परन्तु उस अचित वस्तु को सचित्त काल पत्र
आदि से ढंक कर दिया अथवा चित्त कमल पत्र प्रादि पर रख कर दिया इस तरह सन्चित्त सम्बन्ध को अपेक्षा हरितपिधान और हरितनिधान ये दो अतिचार बनते हैं। .. मुनि को आहार दिया तो सही, परन्तु वेगार समझकर अनादर भाव से दिया इस · स्थिति में अनादर नाम का अतिचार बनता है। अाहारादि की विधि को भूल जाने अथवा किसी वस्तु के देने या न देने का स्मरंगा न रखने पर अस्मरगा नाम का अतिचार होता है । और दूसरे दांता के गुणों में असहनशीलता के होने पर मत्सरस्व नाम का अतिचार होता है। तावार्थसूत्रकार ने सचिस निक्षेप, सचित्तपिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिकम ये पांच अतिचार बताये हैं। उनमें सचित्तनिक्षेप, सचित्तपिधान और मत्सरत्व ये तीन अतिचार तो समन्तभद्र स्वामी के द्वारा प्रतिपादित अतिचारों में भी परिगरिंगत है। परन्तु पट्यपदेश और कालातिक्रम ये दो अतिचार भिन्न हैं । दूसरे दातार के द्वारा देने योग्य वस्तु को देना परव्यपदेश है । अथवा स्वयं पाहार न देकर नौकर-चाकरों से दिलाना यह अनादर नामक अतिचार का ही
मान्तर है । अाहार के समय को उल्लंघन कर देर में ग्राहार देना यह बालातिकम नाम का अतिचार है।
प्रश्न :--सामायिक प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर : --जो चार बार तीन तीन यावत करता है, चार प्रणाम करता है, कायोत्सर्ग में खड़ा होता है, बाह्याभ्यन्तर परिग्रह का त्यागी होता है, दो बार बैठकर नमस्कार करता है, तीनों योगों को . जुद्ध रखता है और तीनों संध्यायों में वन्दना करता है, वह सामायिक प्रतिमाधारी है।
चतुरावर्तनितयश्चतुः प्रणामः स्थितो यथाजातः ।
सामयिको द्विनिषद्यस्त्रियोग - शुद्धस्त्रिसन्ध्यमभिवन्दी ।।१०७।।
इस लोक में से सामायिक प्रतिमा का लक्षण बतलाते हुए उसकी विधि का भी। निण किया गया है. । सामायिक करने वाला पुरुप एक-एक कायोत्सर्ग के बाद चार बार.
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