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________________ अध्याय : पांचवां ] [ १७५ तीन पावर्त करता है, अर्थात् प्रत्येक दिशा में "मो अरहताण" इस प्राय सामायिक दण्डया और "थोस्सामिहं" इस अन्तिम स्तव दण्डक के तीन-तीन यावर्त और एक-एक प्ररणाम इस तरह वारह प्रावर्त और चार प्रणाम करता है । श्रावक इन आवर्तादिक की क्रियानों को खड़े होकर करता है, सामायिक को अवधि के भीतर यथाजात नग्न मुद्राधारी के समान वाह्याभ्यन्तर परिग्रह की चिन्ता से दूर रहता है । 'देववन्दना करने वाले को प्रारम्भ में और समाप्ति में बैठकर प्रणाम करना चाहिये इस विधि के अनुसार दो बार बैठकर प्रणाम करता है अर्थात् सामायिक प्रारम्भ करने के लिये प्रथम बार कायोत्सर्ग कर तीन आवर्त करता है, उसके बाद बैठकर पृथिवी में शिर भुकाता हुआ नमस्कार करता है । और सामायिक के बाद कायोत्सर्ग करता है । उसके बाद भी बैठकर पृथिवी में शिर झुकाता हुना नमस्कार करता है और सामयिक के बाद कायोत्सर्ग करता है, उसके बाद भी बैठकर पृथिवी में शिर झुकाता हुंा नमस्कार करता है । तीनों को शुद्ध रखता है अर्थात उनके सावद्य. व्यापार का त्याग करता है और तीनों संध्यायों में वन्दना करता है । यह प्रतिमाधारी श्रावक तीनों ही काल प्रातः, मध्याह्न नौर सायंकाल में कम से काम अडतालीस मिनट तो सामायिक करने को नियम से बैठता है, सामायिक का काल उत्कृष्ट रूप से सवा दो घण्टे का है। दूसरी प्रतिमा में जो सामायिक शिक्षाबत है, उसका शीलबत के हप में पालन होता है। उसमें २ घडी के समय का और तीन बार करने का नियम नहीं रहता है । परन्तु सामायिक प्रतिमा में नियम रहता है । प्रश्न :-प्रोषधोपनास प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--जो प्रत्येक मास में चारों पर्व के दिनों में अपनी शक्ति को न छिपाकर प्रोषध सम्बन्धी नियम को करता हुआ एकाग्रता में तत्पर रहता है, वह प्रोषधोपवास प्रतिमाधारी है। पर्वदिनेषु चतुर्वपि मासे मासे स्वशक्तिमनि गुह्यः । . प्रोषधनियमविधायी परिणधिपर प्रोषधानशनः ॥१०८।। 'प्रोपधेन अनशनमुपवासो यस्यासौ प्रोषधानशनः' इस विग्रह के अनुसार बारा-पारणा के दिन एकासन के साथ पर्व के दिन जो उपवास करता है, वह प्रोपधोपवास अत का धारक कहलाता है । इस प्रतिमा के धारी को प्रत्येक मास की दो . अष्टमी और दो चतुर्दशी इस प्रकार पर्व के चारों दिनों में अपनी शक्ति को न छिपा
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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