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________________ HER SE H SAMPARAN ANA [ मो. प्र. चिन्तामणि कर उपवास करना होता है। साथ ही धारणा-पारणा के दिन नियम पूर्वक एकासन करना होता है । इस प्रतिमा का धारक शुभ ध्यान में तत्पर रहता है। . . . जिन प्राचार्यों ने प्रोषध का अर्थ एकासन न कर पर्व किया है, उनके मत से ' 'प्रोषधानशनः' शटद का समास इस प्रकार होता है ‘प्रोण पर्वणि अनशनमुपवासो यस्यासी' अर्थात् पर्व के दिन जो उपवास करता है । इस पक्ष में प्रोषधनियमविधायी . इस शब्द का विग्रह इस प्रकार होता है.--'प्रोषधस्य पर्वणो नियमं विदधातीति - प्रोषधनियमविधायी' अर्थात् पर्व के दिन पञ्च पापों, अलंकार, ग्रारम्भ, गन्धपुष्प, ..... स्नान, अंजन, तथा. नस्य आदि के त्याग का जो नियम बताया गया है, . उसका पालन करता है और उपवास के समय अपने चित्त को एकाग्र रखता है । अर्थात् शुभ ध्यान में लीन रहता है। प्रागिणधानं 'प्रणिधिः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रणिधि का अर्थ चित्त की एकाग्नता है, उसमें जो तत्पर है, वह प्रविधिपर . कहलाता है । यहां चित्त की एकाग्रता से शुभ व्यान. का अर्थ ग्राह्य हैं । श्लोक में जो 'स्वशक्तिमनिगुह्य' पद दिया गया है, उससे सूचित किया है कि शक्ति के रहते हुए तो अवश्य ही उपवास करना चाहिये । परन्तु वृद्धावस्था या बीमारी ग्रादि के कारण यदि उपवास की शक्ति क्षीण हो गई है, तो अनुपबास या एकासन भी कर सकता है। प्रश्न : -सचित्त त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? उत्तर :-----जो दया की मूर्ति होता हुना, अपक्व - कच्चे मूल, फल, शाक; शाखा, करीर, कन्द, प्रसून और बीज को नहीं खाता है, वह यह सचित्त त्यागी हैं । मूल फल शाक शाखा करीर कन्द प्रसून बोजानि । नामानि योऽति सोऽयं सचित्त विरतो दयामूर्तिः ॥१०६।। मली, गाजर, · शकरकन्द ग्रादि मल कहलाते हैं, प्राम, अमरूद ग्रादि फल कहलाते हैं, भाजी को शाक कहते हैं, वृक्ष की नई कोपल को शाखा कहते हैं, बांस के - अंकुर को करीर कहते हैं, जमीन में रहने वाले अंगोठा आदि को कन्द कहते हैं । गोभी आदि के फूल को प्रसून कहते हैं और गेहूं चना आदि को वीज कहते हैं। ये सब .... अपक्व अवस्था में सचित्त-संजीव होते हैं । अतः दया का बारक 'श्रावक इन्हें नहीं खाता है, गेहूँ चना ग्रादि बीज हरी अवस्था में तो सचित्त हैं ही, परन्तु अंकुरोत्पादन की शक्ति की अपेक्षा शुष्क ग्नावस्था में भी सचित्त माने जाते हैं, अत: ब्रती मनुष्य इन्हें खण्डित अवस्था में ही खाता हैं। इस श्लोमा में जो मूल आदि बनस्पतियां गिनाई गई हैं, वे उनकी जातियां । INE । ....13
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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