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________________ अध्याय : पांचवां ] । १७७ : बतलाने के अभिप्राय से गिनाई गई हैं। ये सभी भक्ष्य हैं यह अभिप्राय नहीं लेना चाहिये, क्योंकि उनमें मूल, कन्द तथा प्रसून स्पष्ट ही बहुधात तथा बसघात का कारण होने से अभक्ष्य हैं । अतः इनका त्याग भोगोपभोग परिमारणबल में करा जा चुका है। यहां इनका 'अपक्व' अवस्था में त्याग बताया है । इसलिए पक्व अवस्था में ये ग्राह्य हैं। ऐसा फलितार्थ लगाकर व्रती मनुष्य को इनके सेवन में प्रवृत्ति नहीं करना 'श्राहिये । 'इस प्रसंग में स्वत: स्वभाव से सूखी हुई सोंठ तथा हल्दी आदि का दृष्टान्त देना संगत नहीं है, क्योंकि उनका उपयोग औषध के रूप में जब कभी होता है, अतः रागांश की तीव्रता नहीं रहती । परन्तु मूली, गाजर, आलू, अदरख अादि के सेवन में .. स्पष्ट हो राग की तीव्रता रहती है, जो कि वृती मनुष्य के लिये त्याज्य हैं। फल, शाक, शाखा आदि. जो भक्ष्य वनस्पतियां हैं. :. उन्हें छिन्नभिन्न या अग्नि में पकाकर लेना चाहिये। सुक्कं पक्कं ततं अंविल लघणेरण मिस्सियं दत्वं । ..... जज तेरा यछिण्णं तं सव्वं फासुवं भरिणयं ॥११०लाटी संहिता-७-१७१. भक्षणेऽत्र सचित्तस्य नियमो न तु स्पर्शनम् ।... । तत्स्वहस्तादिना कृत्वा प्रासुकं चात्र भोजयेत् ।।१११॥ला. सं. ७-१७ .. यद्यपि छिन्नभिन्न करने में दोष आता है, लेकिन इस प्रतिमा में इतना सूक्ष्मता का विचार नहीं होता है. 1 सचित त्यागी व्रती को प्रत्येक भक्ष्य वनस्पतियों को अचित्त करके ही खाने के उपयोग में लेना चाहिये । प्रश्न :--रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? उत्तर :--जो जीवों पर दयालुचित्त होता हुआ रात्रि में अन्न, पेय, खाद्य और लेह्य – चाटने योग्य पदार्थ को नहीं खाता है, वह रात्रि मुक्ति त्याग प्रतिमाधारी श्रावक है। अन्नं पानं खाद्य लेह्य नाश्तातियो विभावर्याम । सच रात्रिभक्ति विरत: सत्वेष्वनुकम्पमानमनाः ।।११२।। वह श्रावक रात्रि भुक्तिविरति - रात्रि भोजन त्याग प्रतिमाधारी कहलाता है जो जीवों पर दयालु चित्त होता हुमा रात्रि में अन्न-दाल, भात, ग्रादि. पान -- द्राक्ष आदि का रस, खाद्य-लड्डू आदि और लेह्य-रवडी आदि को नहीं खाता है। ..
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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