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________________ . । ... १७८ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिग .. इस प्रतिमा का नाम रात्रि भोजन त्याग प्रतिमा है । प्रश्न है कि जब छठवीं प्रतिमा में चार प्रकार के प्राहार का त्याग कराया जा रहा है । तब. क्या इसके पहले रात्रि भोजन की छूट रहती है ? दूसरी सोर जव पहली दर्शन प्रतिमा में ही रात्रि. जल का त्याग हो जाता है, तब भोजन की सम्भावना ही कहां रहती? इस स्थिति में इस प्रतिमा की क्या उपयोगिता हैं ? इसका उत्तर यह है कि इस प्रतिमा के पूर्व की प्रतिमाओं में कृत की अपेक्षा नहीं, परन्तु इस प्रतिमा में कृत, कारित, दमोदना तथा मन, वचन, काया इन नौ कोटियों से त्यांग हो जाता हैं। इस प्रतिमा का धारी श्रावक न स्वयं रात्रि को भोजन करता है. न दूसरों को कराता है और न करते हुए की अनुमोदना करता है। किन्हीं-किन्हीं प्राचार्यों ने इस प्रतिमा का नाम दिवामैथुन त्याग रखा है, अर्थात् दिन में मैथुन का त्याग होना । यहां भी प्रश्न होता है कि जब दूसरी प्रतिमा में ब्रह्मचर्याणुगत के अतिचारों में कामतीमाभिनिवेश नामक अतिचार का त्याग हो जाता है, तब पांचवी प्रतिमां तक दिदा मैथुन की संभावना कहां रहती हैं, जिसका कि इस प्रतिमा में त्याग कराया जाता है ? बिना कामतीनाभिनिवेश के दिवामैथुन में प्रवृत्ति नहीं हो सकती, उसका उत्तर यह है कि इस प्रतिमा में उपयुक्त नौ कोटियों से त्याग होता है। प्रश्न :-ब्रह्मचर्य प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? . . . ... उत्तर :-शुक्र शोगितरूप भलसे उत्पन्न मलिनता का कारण मलमूत्रादि को भराने बाले दुर्गन्ध से सहित और पलानि को उत्पल करने वाले शरीर को देखता हुभा जो काम सेवन से विरत होता है, वह ब्रह्मचारी अर्थात् ब्रह्मचर्य प्रतिमा का बारक होता है। मलबीजमलयोनि गलन्मलं पूर्ति गन्धि बीभत्सम् ।। पश्यनङ्गमनङ्गाद्विरमतियो ब्रह्मचारी सः ॥२२॥११३॥ काम से प्राकुलित स्त्री-पुरुष एक दूसरे के शरीर को देखकर उसके सेवन में, प्रवृत्त होते हैं । यहां शरीर की यथार्थता का वर्णन करते हुए कहा गया है कि यह शरीर मलवीज हैं अर्थात शुक्रशोगितरूप मल ही इसका कारण है, मलयोनि है अर्थात् । मलिनता-अपवित्रता का कारण है। इससे सदा मलमूत्र तथा पसीना आदि झरता । .. रहता है, दुर्गन्धित है, और, बीभत्स है अर्थात समस्त अवयवों में देखने वालों को ग्लानि
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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