SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 231
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ REC अध्याय : पाँचयाँ । ] १७६ उत्पन्न करने वाले हैं । इस प्रकार शरीर के घृणित रूप का विचार जो कामसेवनमैथुन क्रिया से निवृत्त होता है, वह ब्रह्मचारी है। : ब्रह्माणि अात्मनि चरतीति ब्रह्मचारी' जो आत्मा में चरण करता है-अपने ज्ञातादृष्टा स्वरूप में लीन रहता है, वह ब्रह्मचारी है। जिस पदार्थ से राग घटाना, इष्ट होता है, उसके विभत्सरूप का चिन्तन करना आवश्यक होता है। यहां प्राचार्य को शरीर से राग घटाना इष्ट है, उसके बिभत्सरूप का वर्णन किया गया है । तत्व दृष्टि से विचार करने पर शरीर ना काही स्थान है, क्योंकि माता-पिता के शुक्रजोगितरूप अपवित्र उपादान से इसकी उत्पत्ति हुई है, मलिनता-अपवित्रता का कारण है, मगरे का समय ३५ नव द्वारे अपवित्र पदार्थ करते हैं। दुर्गन्धित हैं, और देखने वालों को ग्लानि उत्पन्न करने वाला है, ऐसे शरीर से राग घटा कर विषय सेवन से निवृत होना ब्रह्मचारी का लभरा है । ब्रह्मचर्य की साधना के लिये शरीर की ओर से अनुराग भरी दृष्टि को हटाकर अपने ज्ञानानन्दः स्वभाव में दृष्टि स्थिर करना त्राहिये । ब्रह्मचारी की वेषभूपा रहन सहन तथा भोजन आदि सभी सात्त्विक रहते हैं। प्रश्न :- प्रारम्भ त्याग प्रतिमाका का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- जो प्राण घात के कारण सेवा, खेती तथा व्यापार आदि प्रारम्भ से निवृत्त होता है, वह प्रारम्भ त्याग प्रतिमा का धारक होता है । सेवा कृषि वाणिज्य प्रमुखादारम्भतो न्युपारमतिः ।। प्राणाति पातहेतोर्योऽसावारम्भविनिवृत्तः ॥११४॥ यहाँ प्रारम्भ से निवृत्त होने के लिये ग्रंथकार ने 'व्युपारमति' क्रिया का प्रयोग किया है, जो थि, उप और पाङ उपसर्गपूर्वक रम धातु का रूप है । उगसगों के . कारण उसका अर्थ 'विशेषेगा पासमन्तात् अारम्भेभ्य उपरतो जायते' अर्थात् प्रारम्भ से विशेषतापूर्वक सब ओर से निवृत्त होना होता है । प्रारम्भ का अर्थ परिग्रह संचय करने की विधि विशेष है । उस विधि में सेवा-नौकरी, खेती तथा वाणिज्य' प्रमुख है। पारम्भ त्याग क्यों किया जाता है ? इसका समाधान करने के लिए प्रारम्भ का. 'प्रारणातिपात हेतोः' यह हेत्वर्थक विशेषण दिया है, अर्थात् जो प्रारम्भ, प्राण घात का हेतु है, उससे उसकी निवृत्त होना चाहिये । इस विशेषण के देने से यह सिद्ध हो जाता है कि प्रारम्भत्यांग प्रतिमा का. धारी श्रावक अभिषेक, दान, पूजन आदि का
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy