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________________ १८० ] [ गो. प्र. चिन्तामरिह प्रारम्भ कर सकता है । उससे उसकी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि वह प्राण घात का पारण नहीं है प्राविहिंसा को बचाकर ही कार्य किये जाते हैं। यहां यह विकल्प उठाया जा सकता है, कि जिस वाशिज्य आदि प्रारम्भ में प्राणिहिंसा नहीं होती, उसे कर सकता है क्या ? इसका उत्तर टीकाकार ने दिया है कि ऐसे प्रारम्भ से उसकी निवृत्ति न हो यह हमें अनिष्ट नहीं है अर्थात् स्वीकृत है, क्योंकि जो प्रारम्भ प्राण घात का हेतु है, उसी से निवृत होने वाले श्रावक के यह प्रतिमा होती है ! . प्रश्न यह उठता है कि प्रारम्भ त्यांग प्रतिमा का धारी श्रावक पंच सूनायों का भी त्यागी होता है ? अपने स्नान आदि के लिये पानी भरेगा ? अपने वस्त्र स्वयं धोवेगा? अपने स्थान को बुहारी से साफ करेगा ? और अपने लिये भोजन बनावेंगा या नहीं ? समन्तभद्रं स्वामी ने प्रारम्भ के लिये जो · 'सेवा कृषि वाणिज्य प्रमुखात्'." और 'प्राणातिपात हेतोः' ये दो विशेषरण दिये हैं, उनसे सिद्ध होता है कि यहां व्यापार सम्बन्धी प्रारम्भ का त्याग कराना ही उन्हें इष्ट है । संस्कृत टीकाकार का भी यही भाव विदित होता है । अागामी प्रतिमा का नाम परिम्ह त्याग प्रतिमा है उस प्रतिमा की भूमिका के रूप में प्रारम्भ त्याग प्रतिमा है, अर्थात जो आगे चल कर परिग्रह का त्याग करने वाला है, उसे इस प्रतिमा में नवीन परिग्रह का अर्जन करना । छोड़ देना चाहिये । जो कुछ पहले का किया हुआ संचय उसके पास है, उसीसे अपना । निर्वाह करना चाहिये । संस्कृत टीकाकार की तो यह भी संमति जान पड़ती है कि जिस प्रारम्भ में प्राणिघात नहीं है, वह प्रारम्भ भी किया जा सकता है। इस प्रतिमा का धारी श्रावक परिग्रह रखते हुए भी निमन्त्रण न होने की स्थिति में स्वयं भोजनः । बनाकर नहीं खांव-भूखा रहे, यह कुछ . उचित नहीं जान पड़ता। इस प्रतिमा का धारक श्रावक भोजन के विषय में स्वाश्रित है, पराश्रित नहीं हैं । इसलिये वह सावन - धानी पूर्वक अपना भोजन स्वयं बना सकता है और पात्र दान का अवसर आता है, तो उसे भी कर सकता है । पानी भरना, कपड़े धोना तथा अपने स्थान को कोमल वुहारी आदि से साफ करना यह कार्य स्वयं सिद्ध है । 'सेवा कृषि वाणिज्य प्रमुखात्' इस । विशेषण में जो प्रमुख शब्द हैं, उसेसे पशु पालन आदि हिंसक व्यापारों का संग्रह । करना विवक्षित हैं, सूनाओं का नहीं, स्वामी समन्तभद्र ने 'अपसूनारम्माणामार्याणा मिष्यते दानम्' इस श्लोक में सूनायों और प्रारम्भों का पृथक् पृथक् उल्लेख किया है। इससे सिद्ध होता है कि उन्हें प्रारम्भ शब्द से व्यापार ही अभीष्ट है, सूनाओं का है।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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