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PRENA
Y.Phakke
अध्याय : पांचवां ।
. [ १८१ . प्रारम्भ में समावेश करना उन्हें अभीष्ट नहीं है। .
प्रश्न :- परिग्रह त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ?
उत्तर :-~-दश प्रकार के बाह्य परिग्रह में ममता भाव को छोड़कर : निर्ममत्व भाव में लीन होता हुआ जो अात्म स्वरूप में स्थित तथा संतोष में तत्पर .. रहता है, वह सब ओर से चित्त में स्थित परिग्रह से विरत होता है ।
बाह्मषु दशषु वस्तुषु ममत्व मुत्सृज्य निर्ममत्वरतः। स्वस्थः संतोषपरः परिचित्त परिग्रहाद्विरतः ॥११५॥
'परि समन्तात् चित्तस्थः परिग्रहोहि. परिचित्त परिग्रहः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो परिग्रहं निरन्तर चित्त में स्थित रहता है, ऐसे ममता के स्थान भूत परिग्रह को परिचित परिग्रह कहते हैं। इस परिग्रह से विरत वही हो सकता है, जो क्षेत्र, बास्नु, वन, धान्य, द्विपद, चतुष्पद, शयनासन, यान, कुप्य और भाण्ड इन दश बाह्य वस्तुओं में ममता-मूळ भाव को छोड़कर निर्ममत्व भाव में स्थित रहता है, अर्थात् ऐसा विचार करता है कि ये बाह्य पदार्थ मेरे नहीं हैं और मैं भी इनका नहीं है, मायाचार प्रादि से रहित होकर. सदा स्वस्थ रहता है--अपने ज्ञाता दृष्टा स्वरूप में स्थित रहता है, और संतोष में तत्पर रहता है-परिग्रह की आकांक्षा से निवृत्त रहता है।
क्षेत्रमिति--जहां धान्य उत्पन्न होता है, ऐसे डोहलिका आदि स्थानों को खेत कहते हैं । जिस खेत में चारों और से बंधान डालकर. पानी रोक लेते हैं । ऐसे · धान्य के छोटे-छोटे खेतों को डोहलिका कहते हैं, इन्हे ग्राम्य भाषा में मढ़ा या डैया
आदि भी कहते है । मकान प्रादि को वास्तु कहते हैं। सोना चांदी आदि को धन कहते हैं धान, गेहूँ, चना ग्रादि को धान्य कहते हैं । दासी दास यादि को द्विपद कहते हैं, गाय, भैस ग्रादि को ग्रासन कहते हैं, डोली-पालकी प्रादि को यान कहते हैं, रेशन, सूती तथा कोशा आदि के वस्त्रों को कुप्य कहते हैं और चंदन, मंजीठ, कांसा तथा ताम्बा आदि के बर्तनों को भाण्ड कहते हैं । यह दश प्रकार का परिग्रह उपयोगी होने से निरंतर मनुष्य के मन में स्थित रहता है, इससे ममत्व भाव को छोड़ना सो . परिग्रह त्याग प्रतिमा कहलाती है। .. जो परिग्रह अनुपयोगी रूप से घर में पड़ा है, उसके त्याग में कोई खास. ... महत्त्व नहीं रहता, क्योंकि त्याग के पूर्व भी. उसमें खास ममत्व. भाव नहीं रहता।
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