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________________ १८२ ] [ गो. प्र. चिन्तामरिण किन्तु जो गृहस्थी के निर्वाह के लिये प्रावश्यक होने से मन में अपना स्थान बनाये रखते हैं, वहीद होना इस प्रतिमा की विशेषता है । बाह्य परिग्रह के त्याग का कारण संतोष है, क्योंकि जब तक संतोष नहीं होता तब तक त्याग नहीं हो सकता, इसलिये ग्रंथकर्त्ता ने त्याग करने वाले को 'संतोषपरः' विशेषणा दिया है, जितना कुछ परिग्रह उसने अपने लिये निश्चित किया है, उसमें संतुष्ट रहने से ही उसके व्रत की रक्षा हो सकती है। त्याग करने का लक्ष्य स्वस्थ होना है, अर्थात् अपने ज्ञाता दृष्टा स्वभाव में स्थिर होना ही परिग्रह त्याग का प्रयोजन है । यदि इस प्रयोजन को और लक्ष्य नहीं है, तो उस त्याग से लाभ नहीं होता । परिग्रह त्याग प्रतिमा का धारी श्रावक अपने निर्वाह के योग्य वस्त्र तथा बर्तनों को रखकर शेष परिग्रह से अपना स्वामित्व छोड़ देता है। यदि पुत्र है तो समीचीन शिक्षा के साथ अपने परिग्रहका भार उसे सौंपता है । यदि पुत्र नहीं है तो दत्तक पुत्र या भाई भतीजा श्रादि को परिग्रह का भार सौंपकर निश्चिन्त होता है । घर रहता है और घर में भोजन करता है | यदि अन्य साधर्मी भाई निमन्त्रणा करते हैं, तो उनके घर भी जाता है। स्वयं व्यापार नहीं करता, परन्तु पुत्र प्रादि यदि किसी वस्तु के संग्रह आदि में अनुमति मांगते हैं, तो उन्हें योग्य अनुमति देता है । प्रश्न : - अनुमति त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? उत्तर :- निश्चय से खेती आदि के आरंभ में प्रथवा परिग्रह में अथवा इस . लोक सम्बन्धि कार्यों में जिसकी अनुमोदना नहीं हैं, वह समान बुद्धि का धारक श्रावक अनुमति त्याग प्रतिमा का धारी माना जाना चाहिये । अनुमतिशरम्भे वा परिग्रहे एहि केषु कर्मसु वा । नास्ति खलु यस्य समधीरनुमतिविरतः स मन्तव्यः ॥ ११६ ॥ जो खेतीयादि प्रारम्भ, धनधान्यादिक परिग्रह तथा इस लोक सम्बन्धि विवाह आदि कार्यों में अनुमति नहीं देता तथा इष्ट अनिष्ट परिणति में बुद्धि रहता है। उसे अनुमति त्याग प्रतिमा का धारक भावक जानना चाहिये । प्रारम्भ त्याग प्रतिमा में नई कमाई का त्याग करता है, परिग्रह त्याग प्रतिमामें परिग्रह के स्वामित्व से निवृत होता है और अनुमति त्याग प्रतिमा में परिग्रह सम्बन्धि किसी प्रकार की अनुमति भी नहीं देता । पुत्र आदि उत्तराधिकारी अपनीबुद्धि से जो कुछ करते हैं, उसमें मध्यस्थ भाव रखता है। हानि लाभ के अवसर पर
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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