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________________ अध्याय : पांचवां ] चित्त में संश्लेश नहीं करता । भोजन के अवसर पर घर के या समाज के लोगों में जो भी प्रार्थना करते हैं, उनके यहां भोजन करता है, किसी का निमन्त्रण पहले से स्वीकृत नहीं करता और न किसी से किसी इच्छित वस्तु के बनाने आदि की इच्छा प्रकट करता है। एक बार ही आहार पानी को ग्रहण करता है। इस प्रतिमा का धारी श्रावक पारलौकिक धार्मिक कार्यों में अनुमति दे सकता है, परन्तु स्वयं अग्रसर होकर किसी कार्य करने का विकल्प मागे कसर नहीं लेना । . : . ... प्रश्न :- उहिष्ट त्याग प्रतिमा का क्या स्वरूप है ? . . उत्तर :-जो घर से मुनियों के पास बन को जाकर गरु के पास प्रत ग्रहण कर भिक्षा भोजन करता हुया तपश्चरण करता है तथा वस्त्र के खण्ड को धारण करता है, वह उत्कृष्ट श्रावक है ।। गृहलो मुनिवनमित्वा गुरुपकण्ठे व्रतानि परिगृह्य । भक्ष्याशनस्तपस्यन्नुस्कृष्ट । श्चेल' खण्डधरः ॥११७॥ उद्दिष्ट त्याग नामक ग्यारहवें स्थान से युक्त श्रावक उत्कृष्ट कहलाता है. । .. यह कौपीन-लंगोट मात्र वस्त्र को धारण करता है । भिक्षा एवं भक्ष्यं इस तरह स्वार्थ, में गय प्रत्यय अथवा भिक्षाणां समूहो भक्षं इस तरह समूह अर्थ में अरण प्रत्यय होने पर भैक्ष शब्द सिद्ध होता है । इस प्रतिमा का धारी भिक्षा में भोजन करता है अर्थात् मुनियों की तरह चर्या के लिये निकलता है। पड़गाहे जाने पर जहाँ अनुकूल विधि मिलती है, वहाँ भोजन करता है। अथवा जो अनेक भैक्ष्य होता है, वह किमी पात्र में गृहस्थों के घर से भिक्षा को लेता हैं जब उदर पूर्ति के योग्य भोजन एकत्रित हो जाता है तब किसी श्रावक के घर प्रामुक जल लेकर भोजन करता है । इस प्रतिमा को धारण करने वाला श्रावक घर छोड़कर मुनियों के वन में चला जाता है तथा उनके पास प्रत धारण कर उन्हीं की देख-रेख में तपश्चरण करता है । मुनिवन का अर्थ मुनियों का प्राश्चम है । समन्तभद्र स्वामी के समय मुनि, वन में ही निवास करते थे इसलिये उत्कृष्ट श्रावक को गहत्याग कर मुनि वन में जाने की आज्ञा दी गई है। इस समय मुनियों में ग्रामवास या चैत्यबास चल पड़ा है, इस लिए मुनिवन का अर्थ मुनियों का प्राश्रम लिया जाता है। .. . . . विशेषार्थ--इस प्रतिमा धारी को भैश्याशन कहा है । उसी से सिद्ध है कि यह उद्दिष्ट आहार का त्यागी होता है। किसी खास व्यक्ति के उद्देश्य से जो अाहार .
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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