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[ गो. प्र. चिन्तामरिण
बनाया जाता है, वह उदिदष्टाहार कहलाता है. इस प्रतिमा वारी के ऐलक और क्षुल्लक की अपेक्षा दो भेद प्रचलित हैं। ऐलक लिङ्ग का परदा अर्थात् लंगोट धारण करते हैं और क्षुल्लक लंगोट के शिवाय एक खण्ड वस्त्र भी रखते हैं । खण्ड वस्त्र का अर्थ इतना छोटा वस्त्र लिया जाता है कि जिससे सिर ढकने पर पैर न ढक सके. पैर टकने पर शिर न ढक सके । मार्जन के लिये क्षुल्लक मयूरपिच्छ से निर्मित पिच्छी या वस्त्र के एक खण्ड को रखते हैं। तथा ऐलक पीछी हो रखते हैं।
क्षुल्लक केश लोंच भी करते हैं केंद्री, छुरा से क्षौर कर्म कराते हैं। परन्तु ऐलक केश लोच ही करते है | क्षुल्लक पात्र में भोजन करते हैं, परन्तु ऐलक हाथ में ही भोजन करते हैं, क्षुल्लक और ऐलक दोनों बैठकर ही भोजन करते हैं। दोनों ही पैदल विहार करते हैं। रेल, मोटर आदि में यात्रा करना इस पत्र में वर्जित है ।
पहली से लेकर छठवीं प्रतिमा तक के धावक, सातवी से नौवीं प्रतिमा तक के श्रावक को मध्य श्रावक और दसवीं तथा ग्यारवी प्रतिमा के धारक को उत्तमं श्रावक कहा जाता है । ग्यारहवी प्रतिमा के धारक थावक को आर्य कहते हैं, और स्त्री को प्रकिा कहते हैं । प्रायिका सफेद रंग की १६ हाथ की साड़ी रखती है । स्त्री पर्याय में धारण किये जाने वाले व्रत का यह सर्वश्रेष्ठ रूप है, इसलिये इसे उपचार से महाव्रत का धारक माना जाता है । अयिका से उतरता हुआ दूसरा स्थान शुलिका है | यह १६ हाथ की साड़ी के सिवाय एक चट्टर भी रखती है । ऐलक क्षुल्लक ग्रार्थिका और क्षुल्लिका दूसरे दिन शुद्धि के समय बदलने के लिये दूसरा लंगोट चद्दर और साड़ी भी रखती हैं, साथ के ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणो स्त्रियों उसकी व्यवस्था रखती हैं। पिछले दिन के वस्त्रों को धोकर यही मुखाती हैं । प्रायिका के केशलोंच तथा भोजन की विधि ऐलक के समान हैं और क्षुल्लिका के केशलोंच तथा आहार की व्यवस्था शुल्लक के समान है ।
सोधा प्रथमः श्य मूर्धजानायेत् । सित कौपीन संव्यानः कर्त्तार्या वा क्षुरेण वा ||३८||
सागार धर्मामृत - अध्याय ७.
वह उत्कृष्ट श्रावक दो प्रकार का है, सफेद लंगोटी तथा सफेद उत्तरीय वस्त्र को धारण करने वाला, पहिला श्रावक, दाढी मस्तक के केशों को कैची से अथवा