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अध्याय : पांचवां ]
. [१८५. छरी से अलग करे। कहीं कहीं वह श्रावक गेले रंग के कपड़े भी धारण करता है। और एकादश तार की जनेऊ (यज्ञोपवीत ) भो धारण करता है। ऐसा आगम में पाया जाता है।
स्थानादिषु प्रतिलिखेत् मृदूपकरणोन सः। कुर्यादेव चतुष्पामुपवासं च तुविधम् ।।३६॥सा०प०अ०७॥११८।।
जैसे मुनि पिछि रखते हैं, उसी प्रकार जीवों की विराधना से बचने के लिए झुल्लक भी बैठते समय, उठते समय, सोते समय, पुस्तकादि उठाते. रखते समय पिछि में जीवों को बचाने अर्थात् जमीन वगैरह की मदु बस्त्र आदि से शुद्धि करके अासनादि का उपयोग करे और चार पर्व सम्बन्धी उपवासों को जरूर करे। वह अतिथि (मुनि) की तरह पर्वोपवास से सम्बन्ध नहीं छोड़ सकता है।
प्रश्न :- एक घर क्षुल्लक और अनेक घर क्षुल्लक में क्या भेद है ? उत्तर : स्वयं समुपविष्टोऽद्यात्पाणिपात्रेऽथ भाजने ।
.. स श्रावकगृहं गत्वा पात्र पाणिस्त बङ्गणे ।।४० ॥११॥ स्थित्वा भिक्षा धर्मलाभं . भणित्या प्रार्थयेत वा। . मौनेन दर्शयित्वाऽगं लाभालाभे समोऽचिरात् ॥४१॥१२०॥
निर्मत्याऽन्यद् गृहं गच्छेद् भिक्षोद्य क्तस्तु केनचित् ।
भोजनायाथितोऽद्यात्तद्भुक्त्वा यद्भिक्षितं मनाक् ॥४२॥ प्रार्थयेन्यथाभिक्षां यावत्स्वोदर पूररणीम् ।। लभेत प्रासु यत्राम्भस्तत्रसंशोध्य तां चरेत् ।।४३॥ .. . .
अर्थ :-~-क्षुल्लक बैठकर पात्र में भोजन करे अथवा हाथ में श्रावक के द्वारा अपित भोजन करे । क्षुल्लक अपने हाथ में पात्र लेकर भिक्षा को निकाले । श्रावक के घर जादे, धर्म लाभ कहे और भिक्षा की याचना करे । “अथवा मौन से श्रावक के प्रांगन में केवल खड़ा होकर भिक्षा की प्रार्थना करके चला माये । भोजन के मिलने अथवा न मिलने पर किसी प्रकार का हर्ष त्रिपाद न करे, राग द्वेष न करे और दूसरों के घर जावे । यदि बीच में कोई श्रावक भोजन के लिये रोके, प्रार्थना करे, तो उसके .. घर पर भी भोजन करे । . परन्तु इतना ध्यान रहे कि पहले जो भिक्षा प्राप्त की है उसे शोधकर खाने के बाद भोजन करें। यदि किसी ने बीच में न रोका हो तो शरीर के लिए जितनी भिक्षा आवश्यक है उसकी पूर्ति जव-तक न हो तब तक भिक्षा के
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