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________________ [ गो. प्र. चिन्तामरिंग लिये श्रावकों के यहां जावे, तथा जहां पर प्रासुक जल मिले वा संशोधन करके भोजन करे। TA याकलिन संयम शिलापान प्रक्षालनारिए । स्वयं यतेत चादर्पः परथासंघमो. महान् ॥४४॥१२१॥ ततो गत्वा गुरुपान्तं प्रत्याख्यानं चतुर्विधम् । . गृहणीयाद्धिधिवत्सर्वं गुरोरचालोचयेत्पुरः ॥४५॥१२२।। प्रागिरक्षारूप संयम की रक्षा करने की इच्छा करने वाला वह क्षुल्लक विद्या अतिशय आदि के मद से रहित होकर अपने भोजन करने के पात्र को रखना, उठाना : तथा उच्छिष्टादि को स्वच्छ करना आदि अपने हाथ से करें, दूसरे मिष्यादि से न. कराये। शिष्यादि से कराने से महान असंयम होता है । क्षुल्लक आहार के बाद गुरु .. के पास जाकर शास्त्रोक्त विधि से चार प्रकार के आहार का त्याग करे, तथा याहार के लिए जाने से लेकर आने तक जो कुछ भी अपनी चैप्टाएँ हुईं उन सबकी गुरु के सामने आलोचना करें। और गोचरी सम्बन्धी दोगों का निराकरण करने के लिए प्रतिक्रमण करे । अब अनेक घर क्षुल्लक का स्वरूप कहते हैं । . यस्त्वेक भिक्षानियमो गत्वाऽद्यादनु मन्यसो। ..... भुक्त्यमावे पुनः कुर्यादुपवासमवश्यकम् ।।४६॥१२३॥ ग्यारहवीं प्रतिमा धारी क्षुल्लक के दो भेद हैं। एक घर में भिक्षा के नियम वाला तथा अनेक घर भिक्षा करने वाला। उसमें अनेक घर भिक्षा करने वाला क्षुल्लक दातार के घर में जाकर भिक्षा लेकर दूसरे घर में जाकर भोजन कर सकता. है ! परन्तु जिनको एक घर भिक्षा करने का नियम है-वह मुनियों की चर्या होने में वाद दातार के घर जाने तथा उसी के घर में बैठ कर भोजन करे । कारणवशात् .... भोजन नहीं मिलने पर अवश्य ही उपचास करे। एक घर में से निकलकर अनेक घर भिक्षु के समान दूसरे घर में नहीं जावे । उसकी विधि विशेष को कहते हैं... वसेन्मुनिवने नित्यं शुभ येत् गुरूचरेत् । तपो द्विधाऽपि दशधा वैयावत्य विशेषतः ॥४७॥१२४।। वह क्षुल्लक सदैव संयतों के निकट उनके पाश्रम में रहे । धर्माचार्य की सेवा . . .. करे । और अन्तरंग बहिरंग के भेद से दो प्रकार का तप है, उसका आचरण करे । .. ARRANGEENA 89 e R
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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