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अध्याय : पाँच ]
[ १८७ और विशेष रूप से संयमित्रों की आपत्ति को दूर करने वाली दश प्रकार की यायत्ति करे यद्यपि अन्तरंग तप में वैवाति का संग्रह होता है। फिर भी अतिशय रूप से मुख्य कार्य बैयाबृत्य है, यह बताने के लिए उसका अलग से उल्लेख किया जाता है।
ग्यारहवीं प्रतिमा के क्षुल्लक और द्वितीय ऐल्लक एसे दादी को बर्शन किया है। उसमें क्षुल्लक के एक घर भिक्षु तथा अनेक घर भिक्षु ऐसे दो भेदों का यन किया है। . .. : ..
.. मागे द्वितीय उद्दिष्ट विरति श्रावक का लक्षण बताते हैं ---- तद्वद् द्वितीयः किन्त्वार्यसंझो लुञ्चत्यसौ कक्षान् । कौपीन मात्रयुग्धत्ते यतिवरप्रतिलेखनम् ।।४८ सागार धर्मा ।।१२५।।
द्वितीय ऐल्लक श्रावक की क्रिया प्रथम क्षुल्लक के समान ही है । विशेषता केवल इतनी है क्षुल्लक हुरी अादि में वाल बनवा सकता है और एक लंगोटी उत्तरीय वस्त्र रखता है। परन्तु ऐल्लक दाढ़ी तथा शिर के बालों को हाथों से उखाड़ता है, कोनी आदि से नहीं करवा सकता है । तथा गुह्य अंग को प्रच्छादन करने के लिए लंगोटी मात्र रखता है। उत्तरीय वस्त्र नहीं रख सकता। तथा मुनियों के समान संयम का उपकरण पिच्छिका रखे ।
स्वपाणिपात्र एकात्ति संशोध्यान्यन योजितम् । - इच्छाकारं समाचारं मिथः सर्वे तु कुर्वते ।।४६।।सागार ०।१२६॥
एडलक गृहस्थी के द्वारा अपंगण किये हुये ग्राहार को अपने हाथ में ही संशोधन करके भोजन करता है, थाली प्रादि में नहीं कर सकता तथा वे सब ऐल्लक परस्पर में "इच्छामि" में तुम्हारे पद की इच्छा करता हूँ, इस प्रकार साधारण समाचार का व्यवहार करे ।
प्रश्न :-क्या ये क्षुल्लक सिद्धान्त ग्रन्थ वीरचर्यादि कर सकते हैं ? उत्तर :-श्रावको बीर चाहः प्रतिमातापनादिषु ।
- स्यान्नाधिकारी सिद्धान्तरहस्याध्ययनेऽपि च ॥५०॥सागार०॥१२॥
ग्यारहवीं प्रतिमाधारी थांबक स्वयं भ्रामरी के द्वारा वीरचर्या का अधिकारी नहीं है, तथा दिन प्रतिमा ग्रीम ऋतु में सूर्य के सन्मुख, पर्वत के शिखर पर ध्यान करना, बर्षा काल में बर्फ के नीचे ध्यान करना और शीतकाल की रात्रि में चौराहे पर खड़े रहकर ध्यान करना आदि लक्षण वाले. कायक्लेश विशेष, पालापनादि
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