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________________ १८८ ] [ गो: प्र. चिन्तामणि विकाल योग धारण करने का अधिकारी नहीं है तथा मूत्र रूप सिद्धान्त शास्त्र का और रहस्य · रूप प्राचीन शास्त्रों का पढ़ने का अधिकारी भी नहीं हैं । इसीप्रकार . प्रायिकाओं को और सामान्य गृहस्थों को भी उपरोक्त अधिकार नहीं हैं। . [सागार धमामृत, पं० प्राक्षाधर जी, ही. प्रा. सुपाच] ས་ལ་གནང་ * प्रायिकाओं के समाचार का वर्णन * एसो अज्जाणपि य मारो जहाविमो पुवं । ....... सव्वाह्य अहोरते विभासि दम्वो जबाजोगं ॥१२॥ मूलगुगयों के अनुरूप प्राचारणा को समाचार कहते हैं। अर्थात् मुनि के समाचार का इतः पूर्व में जैसा वर्णन किया है, वैसा ही प्रार्थिका का भी वर्णन समझना चाहिए। विशेष यह है कि वृक्षमूलयोग, अातापनयोग, अभ्रावकाशयोग ऐसे योगादिक आचरण का प्रायिकाओं को निषेध है। क्योंकि वह उनके प्रात्मशक्ति के बाहर का है अर्थात् उनके अनुरूप नहीं है। प्रश्न :-श्रायिकाओं का परस्पर किस प्रकार का व्यवहार होता है ? उत्तर :-अपणोणमण फलामो अण्णोण हिरवखरणाभिजुत्तायो। .. गयरोसवेरमाया सलज्जमज्जाद किरियाप्रो ॥१२६॥ ये गायिकाएँ वसतिका में मत्सरभाव छोडकर रहती हैं। अन्योन्य अर्थात अापस में रक्षण करने के अभिप्राय में पूर्ण तत्पर रहती हैं 1. उनसे रोप, वैर, कपट जैसे विकार नष्ट हुए हैं। ये विकार मोहनीय कर्म के विशेष उदय से होते हैं । उनका बह मोहनीय कर्मविशेष नष्ट होने से वे विकार भी नष्ट हुए हैं। लोकापवाद से करना, यह लज्जा का लक्षण है अर्थात् जिस पाचरणा के लोक में अपनी निदा होगी ऐसे आचरण से वे सर्वदा दूर रहती हैं 1 रागद्वेष को दूर रखकर न्याय्य पाचरण करना मर्यादा का लक्षण है । उभयकुलानुरूप प्राचरण को निया कहते हैं । अर्थात् लज्जा, मर्यादा तथा क्रियाओं से वे अयिकाएं अपने चारित्र का रक्षरा करती हैं। प्रश्न :--प्रायिकाओं के विशिष्ट पाचरण क्या हैं ? उत्तर:-प्राज्झयणे परियहे सबणे कहणे तहाणुपेहाए । तविरणपसंजमेसु य अविरहिटुवोग जुत्तानो ॥१३०॥ ।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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