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अध्याय : पांचवां ।
[ १८६ जिस शास्त्र का पूर्व काल में अध्ययन नहीं किया था, उसके अध्ययन में, पढ़े हुए शास्त्र को कंठस्थ करने में, सुना हुअा अथवा न सुना हुअा शास्त्र श्रवण करने में, जिस शास्त्र का ज्ञान आपने को है ऐसे शास्त्र का अन्यों को उपदेश करने में लथा. शास्त्र के जीवादि सात तत्वों को मन से चिन्तन करने में तथा अनित्यादि बारह अनुप्रेक्षाग्नों का मन से बार बार विचार करने में वे प्रायिका सतत तत्पर रहती हैं। अनशनादि बाहा तप तथा प्रायश्चित्तादि अन्तरंग तप पालने में मन, वचन और शरीर से बढ़ रहना, इंद्रियों को वश रखना, जीव. वध से दूर रहना अर्थात् प्राणिसंयम पालना, सतत ज्ञानाभ्यास में उधु क्त रहना; ऐसे कार्यों में वे तत्पर होती हैं । - मन, वचन, कायों से शुभाचरणा करती हैं। इस प्रकार की उनकी प्रवृत्ति .. होती है।
और भी विशेषाचरण अविकार बत्थवेसा जल्ल मलविलित्त चत्त देहायो।
माल किनि दिवालरपडिरूवबिमुद्ध चरियानो ॥१३१॥
जिनके स्वभाव में कोपादि विकार उत्पन्न नहीं होते, जो निर्विकार वस्त्र धारण करती हैं । अर्थात् जो रंगीले तथा चित्र विचित्र बस्त्र कदापि धारण नहीं करती हैं। . जिनकी गति-गमन, विलास रहित व देखना कटाक्ष रहित हैं, (सर्वांग में पसीना नाकर उसके ऊपर धूल बैठती है, ऐसी मलिनता को जल्ल कहते हैं तथा शरीर के एक अवयव में उत्पन्न हुई मलिनता को मल कहते हैं । ऐसे) जल्ल और गाल से जो युक्त है, जिनका देह सजावट से रहित है, धर्म, कुल, कीर्ति और दीक्षा के अनुरूप निर्मल पाचरगा जो धारण करती हैं। अर्थात् क्षमादिक धर्म, माता पिता कुल, यश और व्रत इनको अबाधित रखने वाला पाचरण ये पार्मिकायें धारण करती हैं।
प्रश्न :-वे प्रायिकाएं अकेली रहती हैं अथवा मिलकर रहती हैं ? उत्सर :----अगिहत्थमिस्सरिजलये असलिये विसुद्ध संचारे।
.. दो तिण्णिव अज्जानो बहुगोप्रो वा सह त्यति ।।१३२॥.. जिस स्थान में यायिका निवास करती है, उसका वर्णन इस प्रकार है
जहाँ स्त्री, धन धन्यादि परिग्रह युक्त गृहस्थ नहीं रहते हैं, ऐसे स्थान में वे रहती हैं। तथा जहां पर परस्त्री लपट. चोर, चुगली करने वाला, दुष्ट तथा पशुओं का अभाव हैं, ऐसे स्थान में वे रहती हैं । यतियों के निवास स्थान से भी वह ..