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________________ [ गो. प्र. चिन्तामणि पंच परमेष्ठियों को नमस्कार करने रूप है लक्षण जिसका, ऐसे महामंत्र का चितवन करें, क्योंकि यह नमस्कारात्मक मंत्र जगत के जीवों को पवित्र करने में समर्थ है। स्फुरद्विमलचन्द्राभे दलाष्टक विभूषिते । कजे तत्करिणकासीन मन्त्रं सप्ताक्षरं स्मरेत् ।।४६५॥ दिग्दलेखु ततोऽन्येषु विदिक् पत्रमनुक्रमात । सिद्धादिकं चतुष्कं च दृष्टि बोधादिकं तथा ॥४६॥ - स्फुरायमान निर्मल चन्द्रमा की कान्ति समान पाठ पत्र से शोभित जो कमल है, उसकी करिणका पर स्थित सात अक्षर के शामो मारहतारा' मंत्र का चिन्तवन करें । और उस कणिका से बाहर के पाठ पत्रों में से ४ दिशात्रों के ४ दलों पर गमो सिद्धा, गमो पाइरियाणं, गमो उवमायाणं, गामो लोए सव्वसाहणं, ये ४ मंत्र पद और विदिशाओं के चार पत्रों पर सम्यग्दर्शनाय नमः, सम्यग्ज्ञानाय नमः, सम्यक् चारित्राय नमः, सम्मक्तपसे नमः इन चार नमस्कार मंत्रों का चिन्तवन करें, इस प्रकार अष्टदल का कमल और एक कणिका में नव मंत्रों को स्थापन कर चिन्तवन । करें। श्रियमात्यन्तिकी प्राप्ता योगिनो येऽत्र केचन । अमुमेव महामन्त्रं ते . समाराध्य · केवलम् ॥४६७॥. . .. इस लोक में जिन कितने ही योगियों ने प्रात्यन्ति की लक्ष्मी (मोक्ष लक्ष्मी) को प्राप्त किया है, उन सबों ने एक मात्र इस महामन्त्र का प्राराधन करके ही प्राप्त किया है। .. .. . प्रभावमस्य निःशेषं यौगिनामध्यगोचरम् । . .. . अनीभिज्ञो जनो ब्रूते यः स मन्येऽतिलादित ।।४६८11 इस महामन्त्र का पूर्ण प्रभाव योगी मुनीश्वरों के भी अगोचर है, उनके द्वारा भी कहने में नहीं पाता और जो इसको नहीं जानने वाला पुरुष इसके प्रभाव को ...... कहता है, उसको मैं घायु रोग से प्रलाप करने वाला मानता हूँ। अनेनैव . विशुद्धयन्ति जन्तवः पापपङ्किता। अनेनैव. विमुच्यन्ते भवक्लेशान्मनीषिणः ।।४६६॥ जो जीव पाप से मलिन हैं, वे इसी मन्त्र से विशुद्ध होते हैं और इसी मन्त्र
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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