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________________ अध्याय : पांचवां ] .. [ २६३ प्रणय का वाच्य और यह परमेष्ठी का वाचक है। . हत्कञ्जकरिंगकासीनं स्वरव्यञ्जन वेष्टितम् । स्फीत मत्यन्तदुद्धपं देवदैत्येन्द्र पूजितम् ॥४८६।। प्रक्षरन्मूधिन. संकान्त चन्द्र लेखामृत प्लुतम् । . महाप्रभाव सम्पन्न कर्म कक्ष हुताशनम् ।।४६०॥ महात्तत्त्वं महाबीजं महामन्त्रं महत्पदम् । शरच्चन्द्र निभं ध्यानो कुम्भकेन विचिन्तयेत ॥४६१॥ ध्यान करने वाला संयमी हृदय कमल की कणिका में स्थिर और स्वर व्यञ्जन अक्षरों से बेढ़ा हुग्रा, उज्ज्वल, अत्यन्त दुर्वर्ष, देव और दैत्यों के इन्द्रों से पूजित तथा करते हुए मस्तक में स्थित चन्द्रमा की (लेखा) रेखा के अमृत से अाद्रित, महा प्रभाव सम्पन्न, कर्म रूपी वन को दग्ध करने के लिये अग्नि समान ऐसे इस महा तत्त्व, महाबीज, महातंत्र, महापद स्वरूप तथा शरद के चन्द्रमा के समान गौर वर्ण के बारक 'सो' को कु भक प्राणायाम से चितवन करें। विशेष विधान का प्रकार----- सान्द्रसिदर वरणभं यदि वा विद्रमप्रभम् । चिन्त्यमानं जगत्सर्वं क्षोभ यत्यभिसंगलम् ॥४६२।। जाम्बूनदनिभं स्तम्भे विट्ठा कज्जलस्विषम् । ध्येयं वश्यादिके रक्तं चन्द्रामं कर्मशातने ।।४६३॥ यह प्राव अक्षर गहरे सिंदूर के वर्ण के समान अथवा मूंगे के समान चिन्त बन किया हुया मिले हुए जगत को क्षोभित करता है । तथा इस प्रणव को स्तंभन के प्रयोग में मुवर्मा के समान पीला चिन्तवन करें और द्वेप के प्रयोग में ऋज्जल के समान काला तथा वश्यादि प्रयोग में रक्त (लाल) वर्ण और कमो के नाश करने में चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण का ध्यान करें । इस प्रकार प्रगाव अर्थात् ॐ कार मन्त्र के ध्यान का विधान कह; अव पंच परमेष्ठी के नमस्कार रूप. मल के ध्यान का विधान कहते हैं । चित्र नं. १६ । पंच परमेष्ठि महामन्त्र का चिन्तवन- ... ... . गुरु पञ्च नमस्कार लक्षरणं मंत्र मूजितम् । विचिन्तयेज्जगज्जन्तु . पवित्रीकरणक्षमम् ॥४६४।। Saksirmir-kusunt -..-'- time.AM
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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