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[ गो. प्र. चिन्तामणि
शिखरं तस्य शैलेन्द्र योजनानि नवोतुंगं नानारस्त प्रभाजाल छन्नहेम महातदम् । fararatafroean कल्पद्रुम समाकुलम् ॥१७१६॥ त्रिशद्योजन मानाद्यः सर्वतस्तस्य राक्षसी । संकेति नगरी भांति रत्नर्जाबूनदालया ॥ १७२० ।। मनोहारिभिरुद्यानः सरोभिश्च सवारिजैः । महद्भिश्चेत्यमेश्च सा महेन्द्र पुरीसमा ।।१७२१॥
यही बात श्री सोमसेन विरचित द्वितीय पद्मपुराण में तीसरे अधिकार में
लिखी है ।
चूडाकारं मनोहरम् । पंचाशविपुलत्थतः ॥ १७१८ ॥
ae ateyitrrent स्थितौ तौ राक्षसाथियों संतुष्टौ मेघवाहाख्यं वदतौ धर्मवत्सल ।।१७२२॥ gtitsfer aajniभौधौ राक्षसं नामतो वरं । योजनानां शतसप्त विस्तीर्णः स मनोहरः || १७२३॥ तन्मध्ये त्रिकुटाभिष्यः पर्वतोऽस्ति निधानमृत् योजनानां नवोलुंगः पंचाशद्विस्तमो मतः ॥ १७२४॥ तत्र लंकापुरी भाति त्रिशद्योजन विस्तरात ।
दास्यामः पुरीं तां त्वं स्थित्वा तप्तसुखी भव । १७२५ ॥
इस प्रकार कथन किया है । इससे लंका लवणोदधि में ही जाननी चाहिये । उपसमुद्र में नहीं है ।
प्रश्न :- जो गृहस्थ न तो अरहन्तदेव की पूजा करता है और न पात्रदान देता है, वह किस योग्य है ?
उत्तर :-- जो गृहस्थ न तो भगवान अरहन्तदेव के चरण कमलों की पूजा करता है और न मुनिराजों के लिये शक्तिपूर्वक दान देता है । उस गृहस्थपद के लिये किसी गहरे जल में प्रवेश कर बहुत शीघ्र जलांजलि देना चाहिये । वह गृहस्थ इसी योग्य है । यही बात श्रीपद्मनंदी स्वामी ने पद्मनंदी पंचविशतिका में दूसरे अधिकार में कही हैं