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________________ अध्याय : दसवाँ ) [ ८४३ जानुबन्धे तनूत्सर्गः क्षमणं चतुरंगुले । द्विगुणाः द्विगुणास्तस्मादुपदासा स्युरम्भसि ।।१७०६।। रंडः षोडशभिर्मेये भवन्त्येते जलेजसा । कायोत्सगोपकासाः स्युर्जा काम ततोऽधिका ११७१०।। स्वपरर्थे प्रयुक्तश्च नावाः सरणे सति । स्वल्पं वा बहु वा दद्यात् ज्ञात कालाविको गरगो ॥१७११॥ प्रश्न :--लंका नाम को नगरी कौन से समुद्र में है ? उत्तर :--लका लवणोदधि समुद्र में है । वहां पर ७०० योजन लंबा चौड़ा एक राक्षस नाम काजीप है। उस द्वीप में मेरु पर्वत के समान विचित्रीकूट नाम का पर्वत है । वह नौ योजन ऊँचा है । ५० योजन लम्बा है । उस पर शत्रु प्रवेश नहीं कर सकते, परन्तु जो वहां पहुंच जाये उसे वहां पर अच्छी शरण मिल जाती है ! वह पर्यंत अनेक वनों की शोभा से सुसोभित है । उस पर्वत पर ३० योजन के प्रमाग में लंका नाम की नगरी है । जो कि बहुत ही सुन्दर है । यही बात श्री अजितगाथ के समवशरण में भीम महाभोम नाम के यक्षों ने मेघनाद नाम के विद्याधरों के राजा से कही थी । "हम तुम्हें ऐसी लंकापुरी देते हैं । यहां तुम सुख से रहना" ऐसा पद्मपुराण में लिखा है । देखी श्री रविषेरणाचार्य विरचित पद्मपुराग पर्वत पांचवें में--- खेचराभंक धन्योसि यस्त्वं शरणमागतः । सर्वज्ञमजितं नाथं तुष्टावावामतस्तव ॥१७१२॥ शृणु संप्रति से स्वास्थ्यं यथा भवति सर्वतः । तं प्रकारं प्रवक्ष्याव: पालनीयस्त्वमाययोः ॥१७१३।। संत्यत्र लवसाम्भोधा वण्युग्राहसंकटे । अत्यंतदुर्गमारभ्या . . महाद्वीपाः सहस्त्रंशः ॥१७१४।। क्वचिस्क्रीडति गंधवीः किन्नराणां अवचिद्गणाः। क्वचिच्च यक्ष संघाता: क्वचित्किपुरुषामराः ॥१७१५॥ तत्र मध्येऽस्ति सद्वीपो रक्षसा कोडमक्षमः । योजनानां शतान्येष सर्वतः सप्त कीर्तितः ॥१७१६॥ तमध्ये मेरुवाति त्रिकूटाख्यो महागिरिः । अत्यन्त दुःख प्रवेशोऽयं शरण्यः सद्गुहागहैः ॥१७१७।।
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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