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[ गो. प्र. चिन्तामणि करने का प्रायश्चित्त इस प्रकार है । यदि मुनिराज बिना पिछी के सात पेंड गमन करे तो एक कायोत्सर्ग धारण कर शुद्ध होवे । यदि एक कोश चले तो एक उपवास कर शुद्ध होवे यही बात चारितासार में लिखी है.----
सप्तपादेषु नि:पिच्छः कार्योत्सर्गाद्विशुद्धयति । गव्यूति गमने शुद्धिमुपवासं समश्नुते ॥१७०६॥
कितने ही लोग मुनीश्वरों का स्वरूप पिछी कमण्डलु से रहित मानते हैं । परन्तु उनका यह मानना मिथ्या है । जो मुनीश्वरों का स्वरूप पिछी रहित मानते हैं। वे जिनमत से बाह्य हैं, ये लोग जिनमार्ग में भेद उत्पन्न करने वाले हैं। यही बात नीतिसार में लिखी है
कियत्यपि ततोऽतीते काले श्वेताम्बरोऽभवत् । द्राविड़ो यापनीयश्च केकीसंघश्च मानतः ॥१७०७॥ केकोपिच्छः श्वेतवासो द्राविडो यापनीयकः । निपिच्छश्चेति पंचैते जैनाभासाः प्रकीर्तिताः ॥१७०८।।
इससे सिद्ध होता है कि जो मुनियों को पिछी रहित मानते हैं, वे जैनाभासी हैं, साक्षात् जैनी नहीं हैं । इसलिये पिछी कमण्डलु के बिना मुनि का स्वरूप बन ही नहीं सकता। प्रश्न :-श्री मुनिराज कारण मिलने पर जल में प्रवेश करे या नहीं तथा
नाव प्रावि पानी की सवारी में बैठे या नहीं ? उत्तर :-जो महाव्रती मुनि अपने वा परके लिये जल में प्रवेश करें अथवा नाव में बैठकर पार उतरे तो वे उसका प्रायश्चित्त लेते हैं। वह प्रायश्चित्त इस प्रकार है । यदि मुनि ४ अंगुल जल में प्रवेश करें तो एक कायोत्सर्ग धारण करें, यदि घुटने तक जल में प्रवेश करें तो एक उपवास धारण करें। यदि घुटने से ४-४ अंगुल अधिक जल में प्रवेश करें तो दूना-दूंना उपवास करें। यदि १६ धनुष पर्यंत जल में प्रवेश करे तो कायोत्सर्ग उपवास आदि उससे भी अधिक करें। यदि अपने व दुसरे के लिये नाव में बैठकर पार उतरें तो ज्ञानी और अनेक कलाओं के जानकार वा समय के जानकार श्राचार्य यथायोग्य थोडा बा बहुत प्रायश्चित्त देखें यही बात श्री इन्द्रनंदी विरचित नन्थ में लिखी है
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