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________________ अध्याय : दसवां ] [ ८४१ केषादिरोमहीनांग श्मश्र रेखाविजितम् । सिथतं प्रलंवितहस्तं श्रीवत्सादयं दिगम्बरम् ॥१६६६॥ प्रश्न :-कोटिशिला से एक करोड़ मुनिराज मोक्ष पधारे हैं। उस कोटि शिला को नारायण उठाते हैं । सो वह कोटिशिला किस जगह है ? उत्तर :---यह कोटिशिला नाभिगिरि पर्वत के मस्तक पर हैं । वह एक योजन ऊँची और पाठ योजन चौड़ी है तथा अनेक मुनिराजों का वह सिद्धस्थान है । ऐसी कोटिशिला को हमारा नमस्कार हो । यही बात सोमसेन कृत पद्मपुराण में २२खें अधिकार में लिखी है.-- रावरसेन पुरा पृष्टोऽनंतवीर्यो मुनीश्वरः । प्रात्मनो मरणं कस्य हस्ते देव ! भविष्यति ॥१७००१॥ तेनोक्तं सिद्धशिला यः उद्धरेत्स्वपरक्रमात् । स एव हन्यते त्वां हि चक ण चामुना दृढम् ॥१७०१॥ एतच्छुकत्वाह लक्ष्मीश उद्धरिष्यति नान्यथा । सप्तस्येऽथ विमानस्थास्ती शिला प्रतिनिर्गताः॥१७०२।। जांबूनदश्च सुग्रीवो नलनोलौ विराषितः । इत्यादि बहयो बीरा रात्री प्राप्ताश्च गह्वरम् ।।१७०३।। नाभिगिरि शिरोदेशे शिला योजनमुत्थिता । अष्टयोजन विस्तीर्ण सिद्धस्थान मुनौशिनाम् ॥१७०४॥ सत्रावतीर्य ते सर्वैः सा शिला पूजिता परम् । गंधाक्षतादिभिः पुष्पैः सुरासुरैश्च सेविता ।।१९७० ५।। इत्यादि और भी वर्णन है। जांबूनद और विद्याधर उसी रात को लक्ष्मण को विमान में बैठाकर कोटिशिला के समीप ले गये थे, इससे सिद्ध होता है कि कोटिशिला नाभिगिरि नामक पर्वत के मस्तक पर ही है। कितने ही लोग कोटिशिला को तारंगा आदि अन्य क्षेत्रस्थान में मानते हैं, सो भ्रम हैं । प्रश्न :- मुनिराज बिना पिछी के चले या नहीं ? उत्तर :- यदि मुनिराज किसी जगह परबस होकर बिना मयूर पिछी के गमन करें तो फिर वे उसका प्रायश्चित्त लेकर शुद्धि करते हैं। बिना पिछी के गमन करने पर बिना प्रायश्चित्त लिये मुनिराज कही नहीं रहते हैं । बिना पिछी के गमन
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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