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अध्याय : दसवा ] पूजा न रेज्जिनयतेः पद पंकजेषु,
दानं न संयतजनाय च भक्तिपूर्वम् । नों दीयते किमु ततः सदनस्थिताय,
___ शोघ्र जलांजलिरगावजलं प्रविश्य ।।१७२६॥ .. . प्रश्न :-श्रावकों को सदा प्रातःकाल उठकर सबसे पहले क्या करना चाहिये ?
उत्तर :--श्रावकों को प्रातःकाल उठकर शौच आदि क्रियात्रों से निवृत्त होकर प्रथम ही अरहन्तदेव और निग्रन्थ गुरु का दर्शन करना चाहिये । फिर भक्तिपूर्वक वेदना व उपासना कर धर्मशास्त्रों का स्वाध्याय करना चाहिये पीछे गहस्थ सम्बन्धी अन्य कार्य करना चाहिये । ..
भावार्थ :- जिन दर्शनादि कार्य कर फिर अन्य कार्य करना यह नियम पर-परा से इसी प्रकार का प्राया है। वही बात श्री पद्मनंदी पंचविशंतिका के छठे अधिकार में लिखी है.-- . . . . .
. प्राप्तस्वाय. कसं व्यं देवतागुरुदर्शनम् । . भक्त्या तद्वंदना कार्या धर्मश्च तिकपासकः ॥१७२७॥.. पश्चादन्यानि कार्याणि कर्तव्यानि यतो बुधैः ।। धर्मार्थ काममोक्षासामावौ धर्मः प्रकीर्तितः ॥१७२८॥ :
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों में सबसे पहले धर्म ही कहा है । इसलिये सबसे पहले देवगुरु का दर्शन कर पीछे अन्य कार्य करना चाहिये। प्रश्न :-ऊपर यह बताया जा चुका है कि प्रतिप्ति सबसे पहले देवदर्शन
करना चाहिये देवदर्शन करने के पहले अन्य कार्य नहीं करना चाहिये । परन्तु देवदर्शन किये बिना ही जो भोजनादि कर लेते हैं, उनके लिये शास्त्रों में क्या कहा है. तथा उन्हें कैसा समझना
चाहिये ? . उत्तर :-जिस गांव ब शहर में भगवान अरहन्तदेव का जिनालय हो और वहां पर रहने वाला श्रावक श्रावक होकर भी यदि बिना भगवान के दर्शन किये भोजन करें तो उनको जनशास्त्रों में मिथादृष्टि कहा है । उनको जैनधर्म का श्रद्धान करने चाला कभी नहीं कहना चाहिये । जनशास्त्रों में उनको धर्मभृष्ट बतलाया है। लिखा