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________________ ८४६ ] [ मो. प्र. चिन्तामणि चेयाले जिहठाणे सायय अहिट भोयरसं कुरगई।। सो सुख मिथ्याइट्ठी भट्ठी जिन सासरणे समये ॥१७२६॥ प्रश्न : सामान्य केवली के गंधकुटी में गणधर होते हैं या नहीं ? उkit: सामान्य के के भी गणधर होते हैं । यह बात सुदर्शन चारित्र के आठवें परिच्छेद में कही है - दिध्येन ध्वनिना देवस्तदा सन्मार्गवृत्तये। धर्मतसादि विश्वार्थानवाचेति गरणान्प्रति ।। बिमा गणधर के दिव्यध्वनि नहीं खिरती है। इसलिये जिस प्रकार श्री महावीर स्वामी के गौतम गणधर थे, उसी प्रकार सामान्य केवली के भी गणधर होते हैं। प्रश्न--सामान्य केवली भगवान की गंधकुटी में मानस्तंभ होता है या नहीं, तीर्थर केवली भगवान के तो समवशरण में होता ही है ? उत्तर-सामान्य केवली भगवान की गन्धकुटी में भी मानस्तम्भ होता है । यह बात सुदर्शन चरित्र में लिखी हैं। प्रायौ शक्रोपदेशेन हेमरत्नादिराशिभिः । इंदे गंकुटीरूपं कैवल्यास्थानमंधनम् ॥१७३०॥ ध्वज सिंहासनच्छत्र चामरावि विभूषितम् । शास्त्रोक्त घरांनोपेतं मानस्तम्भाद्यलकृतम् ॥१७३१॥ जगज्जन्तूपकाराय केवलज्ञान भागिनः । परं निर्मापयामास यक्षराट् धर्मसिद्धये ॥१७३२१ प्रश्न-तीर्थकर केवली भगवान के केवलज्ञान उत्पन्न होने के बाद गणधरों की केलियों को विक्रिया ऋद्धि को धारण करने वालों की गणना, जो शास्त्रों में बतलाई है। वह समवशरण में रहने वालों को है अथवा उनके समय की है अर्थात् अनन्तर होने वाले तीर्थपुर के उत्पन्न होने तक की है ? उत्तर-यह मणना समवशरण में रहने वालों की है। श्री ऋषभदेव के समवशरण में जितने मुनि प्रादि वर्तमान थे, उन्ही की संख्या बताई है, वे मुनिराज आदि सब विहार' समय में भी साथ ही रहते हैं । सो ही श्री रविणाचार्य विरचित
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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