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अध्याय : दसवां ]
[ ८४७ पद्मपुराण में चौथे पर्व में लिखी है--
तस्यासीग्दणपालानामशोसिश्रुत्तरा। सहस्त्राणि च तायन्ति साधूनां सुतपोभृताम् ।१७३३।। अत्यन्त शुद्धचित्तास्ते रविचन्नसमप्रभाः। एभिः परिवृताः सर्वेजिना विहरते महीम् ॥१७३४।।
इससे सिद्ध होता है कि गणधर आदि सब सुनियों की गणना समय शरण में रहने वालों की ही समझना चाहिये । समवशरगा की स्थिति से आगे पीछे के मुनि इस संख्या से बाहर है। वे इस संख्या में शालिल नहीं है । जिस प्रकार श्री वृषभ देव के समवशरण में रहने वाले की संख्या बतलाई, उसी प्रकार श्री अजितनाथ से लेकर श्री महावीर पर्यन्त समस्त तीर्थङ्करों की समझ लेना चाहिये। प्रश्न- इस पञ्चमकाल के इस वर्तमान समय में होने वाले मुनिराज किस क्षेत्र
में ठहरें ? वन, उपवन, गुफा, पर्वत, नदी के किनारे स्मशान प्रादि में ही निवास करें अथवा और किसी भी जगह अपनी स्थिति
रक्खें?
उत्तर-इस पंचमकाल में वर्तमान समय में होने मुनियों की स्थिति श्री मन्दिरजी में ही बतलाई है । यह यात श्री पद्मनदी पंचविशतिका के छठे अधिकार में लिखी है
सम्प्रत्यत्र कलौ काले जिनगेहे मुनिस्थितिः । धर्मस्य दानमित्येषां श्रावका मूलकारणम् ॥१७३५॥ धर्म का दान देने के लिये एक श्रावक ही मूल कारण है।
भावार्थ--इस वर्तमान समय में श्रावक ही धर्म सुनने के पात्र है । इसलिये मुनिराजों की स्थिति जिनालय में होने से ही श्रावक को लाभ पहुंच सकता है । श्री इन्द्रनंदी ने नीतिसार में भी लिखा है
काले कलो बने बासो वर्जनीयौ मुनिश्वरै । स्थोपेत च जिनागार प्रामादिषु विशेषतः ।१७३६॥ प्रश्न-जनमत में जप करने की माला को मरिणयों की गिनती १०.५ है।
सो इसका क्या कारण है ? . उत्तर--संसारी जीव हमेशा प्रमाद और कषाय के अधीन रहते हैं तथा
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