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________________ =४८ ] [ गरे. प्र. चिन्तामरि स स्थावरों के भेद से १२ प्रकार के जीवों की मन वचन काय कृत कारित अनुमोदना के द्वारा १०८ भेदरूप पाचों पापों का ग्राश्रव और बंध करते रहते हैं । उन सबकी निवृत्ति के लिये १०= मणियों की माला बनाई गई है। ग्राश्रव बंध के वे १०८ भेद निम्न प्रकार समझना चाहिये । पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, नित्यनिगोद, इतर निगोद, द्विन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरीन्द्रिय असैनी पंचेन्द्रिय, सैनी पंचेन्द्रिय इस प्रकार जीवों के बारह भेद होते हैं । इन १२ प्रकार के जीवों के मन से, वचन से तथा काय से हिंसादिक पाप होते हैं । जो ३६ प्रकार के हो जाते हैं । तथा ३६ प्रकार के पाप स्वयं करने दूसरों से कराने और करते हुखों की प्रनुमोदना के भेदों से १०८ प्रकार के हो जाते हैं । ५२३ x ३० १०० १ सा लगते रहते हैं । उनका नाश करने के लिये १०८ मणियों की माला है । एक मरिण पर एक-एक ग्रामोकार मन्त्र का जाप कर एक-एक पाप का नाश करना चाहिये और इस प्रकार सब पापों का नाश कर डालना चाहिये, सो ही लिखा है पृथ्वी पानोय तेजः पवनसुताः स्थावराः पंचकायाः । नित्याभित्यो निगोदौ युगल शिखि चतुः संस संज्ञित्रसाः स्युः || एते प्रोक्ता जिनें द्वावश परिणिता वाङ्मनः कायभेदः । स्वान्यैः कारितार्थं त्रिभिरपि गुणिताश्चाष्ट भूम्येक संख्या ।।१७३७॥ - इस प्रकार माला में १०८ मगियों के होने का कारण है । इसके सिवाय एक कारण और भी है और वह इस प्रकार है- कोई भी पाप रूप कार्य किया जाता है । उसमें सारंभ, समारम्भ और प्रारम्भ ऐसे तीन भेद पड़ते हैं। किसी भी हिसा श्रादि पाप के संकल्प करने को उसके प्रयत्न के प्रवेश करने को सारम्भ कहते हैं । उसी पाप कार्य के कारणों का संग्रह करना साधन की सब सामग्री इकट्ठी करना समारंभ है । और उस कार्य को प्रारंभ कर देना आरंभ है । इसका उदाहरण इस प्रकार है । किसी ने एक मकान बनाने का विचार किया उसमें संकल्प किया कि इस तरह का मकान बनाऊंगा उसमें इस प्रकार के घर कमरे आदि बनवाऊंगा इसे प्रकार के संकल्प की सारंभ कहते हैं। सारम्भ में किसी काम का बाह्य आरम्भ नहीं होता केवल विचार या उस काम को करने का श्रावेश होता है । सारम्भ के बाद उस मकान को बनवाने के लिये कारीगर ईट चूना पत्थर कुदाली फावड़ा
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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