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________________ अध्याय : दसवां । [ ८४६ आदि साधनों का संग्रह करना समारंभ है । समारंभ में काम का प्रारम्भ नहीं होता है । केवल कारण सामग्नी इकट्ठी होती है । तदनन्तर उस विचारे हुये काम को प्रारम्भ कर देना, जैसे जिस मकान को बनाने का संकल्प किया था । उसके लिये नींव भरना, दीवाल खड़ी करना आदि कार्यों का प्रारम्भ कर देना प्रारम्भ है । इसी प्रकार सब कामों के दृष्टान्त समझ लेना चाहिये । ये सारम्भ, समारम्भ और प्रारम्भ तीनों ही मन से किये जाते हैं । तीनों ही बचन से किये जाते हैं और तीनों ही काय से किये जाते हैं । इस प्रकार ये तीनों योगों से होते हैं । ऐसे उनके ये नौ भेद हो जाते हैं। नौ प्रकार के सारंभ आदिक स्वयं किये जाते हैं । और दूसरे से कराये जाते हैं। और दूसरे करते हुये की अनुमोदना की जाती है। इस प्रकार कृत कारित अनुमोदना के भेद से २८ भेद हो जाते हैं । ये २७ भेद क्रोध से होते हैं। मान से और लोभ से होते हैं। इस प्रकार चारों कषायों से गुणा करने से १०८ भेद हो जाते हैं । इन १०८ भेदों से जीव को हिंसादि पाप लगते हैं । सो ही मोक्ष शास्त्र में लिखा है--- प्राद्य सरंभ समारंभारं भारंभयोग कृत कारितानुमतकषाय विशेष स्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चकशः। इन १०८ पापों की निवृत्ति के लिये. १०८ मरिणयों से णमोकार मन्त्र की अथवा पंचपरमेष्ठी के वाचक अत्य मन्त्रों की जाप तीनों समय करना चाहिये । इनके सिवाय पापों के १०८ भेद और प्रकार से भी हैं । यथा--हिंसादिक सब पाप, क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कषायों से होते हैं । कृत, कारित, अनुमोदना से होते हैं। मन, वचन, काय इन तीनों से होते हैं । तथा भूतकाल, वर्तमानकाल, भविष्यकाल इन सोनों काल सम्बन्धी होते हैं । इन सबको मुरणा कर देने से १०८ भेद हो जाते हैं। भावार्थ-क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कषायों से काययोग के द्वारा स्वयं किये हुये भूतकाल सम्बन्धी पाप । इन्हीं चारों कषायों से काययोग के द्वारा दूसरों से कराये हुये भूतकाल सम्बन्धी पाप, तथा इन्हीं कषायों से काय योग के द्वारा अनुमोदना किये हुये भूतकाल सम्बन्धी पाप, इस प्रकार भूतकाल सम्बन्धी पाप १२ प्रकार के हुटो, इसी प्रकार भूतकाल सम्बन्धी १२ प्रकार के पाप वचनयोग द्वारा तथा १२ प्रकार के मनोयोग द्वारा होते हैं । इस प्रकार ३६ प्रकार के भूतकाल सम्बन्धी पाप, ३६ प्रकार वलेमान काल संबन्धी पाप और ३६ प्रकार भविष्यत्काल सम्बन्धी
SR No.090436
Book TitleGommat Prashnottar Chintamani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti Jaipur
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages1124
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Karma
File Size37 MB
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