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[ गो. प्र. चिन्तामणि पाप होते हैं। इस प्रकार १०८ भेद हो जाते हैं। सो ही धर्मरसिक शास्त्र में लिखा है।
हिंसा तत्र कृता पूर्व करोति च करिष्यति । मनोवचनकायैश्च ते तु त्रिगुरिणता नव ।।१७३८॥ पुनः कृतं स्वयं कारितानुमोदगुणाहताः । सप्लविशति ते भेदा कषायगुणितांश्च तान् ।।१७३६।।
"अष्टोतरशतं ज्ञेयं प्रसत्यादिषु तादृशम्:". इन १०८ पापों को दूर करने के लिये १०८ मरिणयों की माला कही गई है। एक-एक पाप के आश्रद वा बन्ध को नाश करने के लिये एक मन्त्र का जाप करना कहा है । इस प्रकार प्रातःकाल, मध्यान्हकाल और सन्ध्याकाल तीनों समय तीन सौ चौबीस जाप कर पापों को दूर करना चाहियो, तीनों समय जाप करने वालों के लिये तो पाप और धर्म की समानता रहती है । यदि तीन-तीन बार से भी अधिक जप करें या तीन माला से अधिक जप करें तो उसका फल अधिक होता है । यदि तीनों समय की ३ मालाओं से कम जाप करे तो पाप बन्ध रहता है। इसलिये प्रतिदिन ३२४ जाप करने से पूर्व संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं, ऐसा समझकर णमोकार मन्त्र का जप प्रतिदिन तीनों बार एक एक माला जाप अवश्य करना चाहिये।
प्रश्न-जाप करते समय माला को किस प्रकार जपना चाहिये ?
उत्तर--जाप करते समय मन को तो श्री अरहन्त देव के ध्यान में लगाना चाहिये, अपने बायें हाथ को अपनी गोदी में रखना चाहिये ज्ञान सुद्रा धारण करना चाहिये, अपने दायों हाथ के अंगूटे पर माला रखनी चाहिये । तदनन्तर उस ज्ञानी पुरुष को अंगूठे और अंगूठे के पास वाली उंगली से निर्मल जाप की माला को लेकर जाप करना चाहिये । सो ही धर्म रसिक ग्रंथ में लिखा है।
समं ध्याने मनः कृत्वा मध्यदेशेषु निश्चलम् । ज्ञानमुद्रांकितो भूत्वा स्वांके तु बाम हस्तकम् ॥१७४०॥ अंगुष्ठ सर्जनीभ्यां तु सत्यहस्तेन निर्मलाम् । जपमाला समादाय अपं कुर्याद्विलक्षणः ॥१६४१॥
यह जप करने की विधि लिखी, इसके सिवाय जो कोई मनुष्य अपने हृदय में उद्वेग वा चंचलता रखता हा जाप करता है । अथवा माला के मेरुदण्ड को
कमर